नई दिल्ली : देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की योजना ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। इस प्रस्ताव को लेकर समर्थन बढ़ने के दावे किए जा रहे हैं और इसके संभावित क्रियान्वयन को लेकर तैयारियों पर विचार किया जा रहा है।
एक साथ चुनाव कराने के समर्थकों का कहना है कि इससे बार-बार होने वाले चुनावों पर खर्च होने वाले संसाधनों में कमी आएगी और सरकारें लंबे समय तक विकास कार्यों तथा नीतियों के क्रियान्वयन पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेंगी। इसके अलावा चुनावी प्रक्रिया में लगने वाले समय और प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव को भी कम करने की बात कही जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए संवैधानिक संशोधन और कई कानूनी प्रक्रियाओं की आवश्यकता होगी। संयुक्त संसदीय समिति इस मुद्दे पर विचार कर रही है। संभावना जताई जा रही है कि यदि सभी तैयारियां समय पर पूरी होती हैं तो वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ इसे लागू करने का रास्ता साफ हो सकता है।
हालांकि, वन नेशन, वन इलेक्शन को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद भी सामने आए हैं। समर्थक इसे चुनाव सुधार की दिशा में बड़ा कदम बता रहे हैं, जबकि कुछ विपक्षी दलों का कहना है कि इससे राज्यों की स्वायत्तता और स्थानीय मुद्दों पर असर पड़ सकता है।
इस व्यवस्था को लागू करने की राह में सबसे बड़ी चुनौती सभी राज्यों के चुनावी चक्र को एक साथ लाना होगी। इसके लिए कार्यकाल में बदलाव, मध्यावधि चुनाव जैसी परिस्थितियों और अन्य संवैधानिक पहलुओं पर भी विचार किया जा रहा है।













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