वॉशिंगटन : मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और संभावित युद्ध की आशंकाओं के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने बड़ा बयान देते हुए दावा किया है कि ईरान अब समझौते के लिए बेहद उत्सुक दिखाई दे रहा है और यदि वार्ताएं सफल रहती हैं तो यह संघर्ष “बहुत जल्दी समाप्त” हो सकता है। ट्रंप के इस बयान ने वैश्विक राजनीति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भी हलचल पैदा कर दी है।
मंगलवार को मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान अब उस स्थिति में पहुंच चुका है जहां वह किसी भी कीमत पर समझौता चाहता है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की प्राथमिकता युद्ध नहीं, बल्कि ऐसा समाधान है जिससे क्षेत्र में स्थिरता लौट सके। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि दोनों देशों के बीच समझौता हो जाता है तो न केवल युद्ध की आशंका समाप्त होगी, बल्कि दुनिया भर में तेल की कीमतों में भी भारी गिरावट देखने को मिल सकती है।
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब पिछले कई सप्ताहों से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा था। खाड़ी क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज थीं, अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी बढ़ाई जा रही थी और ईरान की ओर से भी कई आक्रामक संकेत सामने आए थे। विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार चिंतित था, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल व्यापार इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति बनती तो उसका सबसे बड़ा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता। कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकती थीं, जिससे अमेरिका, यूरोप, भारत और एशियाई देशों में महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता। इसी कारण ट्रंप प्रशासन पर लगातार दबाव था कि वह सैन्य टकराव की बजाय कूटनीतिक रास्ता तलाशे।
सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने फिलहाल ईरान के खिलाफ प्रस्तावित कुछ आक्रामक कदमों को रोककर वार्ता के लिए समय देने का निर्णय लिया है। माना जा रहा है कि बैक-चैनल डिप्लोमेसी के माध्यम से दोनों देशों के बीच संपर्क बनाए गए हैं। ट्रंप के बयान को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके जरिए वैश्विक बाजार और सहयोगी देशों को यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि अमेरिका तत्काल युद्ध नहीं चाहता।
ट्रंप ने अपने बयान में तेल बाजार का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि यदि समझौता सफल रहता है तो ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौटेगी और तेल की कीमतें तेजी से नीचे आ सकती हैं। उनके इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी दर्ज की गई। निवेशकों ने इसे संभावित राहत के संकेत के रूप में देखा।
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है। यदि मध्य-पूर्व में तनाव कम होता है और तेल सस्ता होता है तो भारत को आर्थिक मोर्चे पर राहत मिल सकती है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन लागत और महंगाई पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ अभी भी स्थिति को पूरी तरह सामान्य मानने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों पुराना अविश्वास इतनी आसानी से समाप्त नहीं होगा। परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध, क्षेत्रीय प्रभाव और सैन्य गतिविधियों जैसे कई मुद्दे अभी भी दोनों देशों के बीच विवाद का कारण बने हुए हैं।
मध्य-पूर्व की राजनीति पर नजर रखने वाले रणनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले कुछ दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे। यदि वार्ता आगे बढ़ती है तो यह क्षेत्र को बड़े युद्ध से बचा सकती है, लेकिन यदि बातचीत विफल हुई तो तनाव फिर तेजी से बढ़ सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली अगली कूटनीतिक गतिविधियों पर टिकी हुई है।













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