जापान जैसे अनुशासित, कानून-प्रधान और संस्थागत मूल्यों वाले देश में किसी धार्मिक स्थल के उद्घाटन को लेकर विवाद पैदा होना अपने आप में असामान्य घटना है। लेकिन जब उस विवाद के केंद्र में पाकिस्तान का राजदूत दिखाई दे, तो प्रश्न केवल एक समारोह तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय कार्यशैली और उसकी कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर भी उठने लगता है।
रिपोर्टों के अनुसार, जापान में एक मस्जिद के उद्घाटन समारोह में पाकिस्तान के राजदूत मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। बाद में यह विवाद सामने आया कि मस्जिद के निर्माण से जुड़े कुछ अनुमतियों और नियामकीय प्रक्रियाओं को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं। जापानी नागरिकों के एक वर्ग ने सोशल मीडिया पर आपत्ति दर्ज कराते हुए पूछा कि यदि निर्माण प्रक्रिया विवादों के घेरे में थी, तो ऐसे कार्यक्रम में किसी विदेशी राजनयिक की उपस्थिति कितनी उचित थी।
पाकिस्तान दूतावास ने सफाई दी है कि राजदूत को बताया गया था कि सभी आवश्यक कानूनी मंजूरियां प्राप्त की जा चुकी हैं और दूतावास का निर्माण संबंधी मामलों से कोई लेना-देना नहीं है। यह स्पष्टीकरण अपनी जगह है, लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या किसी भी विदेशी प्रतिनिधि को स्थानीय संवेदनशीलताओं और संभावित विवादों की पर्याप्त जांच-पड़ताल किए बिना ऐसे आयोजनों में भाग लेना चाहिए?
दरअसल, यह घटना इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि पहले से ही अनेक विवादों और अविश्वास की परतों से घिरी हुई है। दशकों से दुनिया के कई देशों में पाकिस्तान पर कट्टरपंथी तत्वों को संरक्षण देने, धार्मिक मुद्दों को राजनीतिक रंग देने और अपनी विदेश नीति में दोहरे मानदंड अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में जब भी पाकिस्तान किसी धार्मिक परियोजना या आयोजन के साथ जुड़ा दिखाई देता है, स्वाभाविक रूप से अतिरिक्त संदेह पैदा होता है।
जापान की जनता का एक बड़ा वर्ग इस मामले को धर्म के चश्मे से नहीं, बल्कि कानून और प्रशासनिक पारदर्शिता के दृष्टिकोण से देख रहा है। यही किसी आधुनिक लोकतंत्र की पहचान भी है। यदि किसी निर्माण में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कार्रवाई होनी चाहिए, और यदि सब कुछ वैध पाया जाता है तो विवाद स्वतः समाप्त हो जाएगा। लेकिन इस पूरे प्रकरण ने यह अवश्य दिखा दिया है कि पाकिस्तान आज भी ऐसी स्थिति में नहीं है कि उसकी किसी भी गतिविधि को बिना प्रश्नों के स्वीकार कर लिया जाए।
वास्तविक समस्या मस्जिद नहीं है, न ही किसी धर्म विशेष का अस्तित्व। समस्या उस विश्वास की है जिसे पाकिस्तान वर्षों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कमजोर करता आया है। विश्व समुदाय किसी देश की बातों से नहीं, उसके इतिहास और व्यवहार से विश्वास बनाता है। जब किसी राष्ट्र की विश्वसनीयता बार-बार प्रश्नों के घेरे में आती है, तब उसके प्रतिनिधियों की सामान्य गतिविधियां भी विवाद का विषय बन जाती हैं।
जापान की स्थानीय जांच से जो भी निष्कर्ष निकले, वह कानून के अनुसार होना चाहिए। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में प्रतिष्ठा सबसे बड़ी पूंजी होती है। दुर्भाग्य से पाकिस्तान ने वर्षों में अपनी इसी पूंजी को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। इसलिए आज दुनिया के कई हिस्सों में पाकिस्तान की मौजूदगी से पहले उसके इरादों पर चर्चा शुरू हो जाती है।
और यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा संदेश है।













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