डेस्क : भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा हाल ही में विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए उठाए गए कदमों को लेकर एक रणनीतिक रिपोर्ट में चिंता जताई गई है। सिस्टमैटिक्स इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट के अनुसार, ये कदम बढ़ती महंगाई, धीमी आर्थिक वृद्धि और बाह्य क्षेत्र पर बढ़ते दबावों की ओर संकेत करते हैं।
‘आरबीआई का पूंजी प्रवाह बढ़ाने का प्रयास: क्या यह भारत की व्यापक आर्थिक दुविधा का समाधान करेगा?’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्रीय बैंक की हालिया नीति का मुख्य उद्देश्य विदेशी पूंजी को विभिन्न माध्यमों से आकर्षित करना है।
रिपोर्ट के अनुसार, ये कदम ऐसे समय में उठाए गए हैं जब कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण व्यापार घाटा बढ़ रहा है और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश तथा विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में कमजोरी देखी जा रही है, जिससे भुगतान संतुलन पर दबाव बढ़ा है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कमजोर विदेशी पूंजी प्रवाह और बढ़ते आयात बिल के कारण रुपये पर दबाव बढ़ गया है। इस स्थिति से निपटने के लिए आरबीआई ने कई उपायों की घोषणा की है, जिनमें विदेशी निवेशकों के लिए सरकारी प्रतिभूतियों तक अधिक पहुंच, अनिवासी भारतीयों और विदेशी नागरिकों के लिए निवेश सीमा में वृद्धि, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के लिए रियायती बाह्य वाणिज्यिक उधारी सुविधा, विदेशी मुद्रा जमा को समर्थन, निर्यात आय की तेज वसूली और कुछ विदेशी निवेशों के लिए कर प्रोत्साहन शामिल हैं।
सिस्टमैटिक्स इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने कहा कि ये सभी उपाय सीमित अवधि के लिए हैं और सितंबर 2026 तक प्रभावी रह सकते हैं। इनका उद्देश्य अल्प और मध्यम अवधि में विदेशी पूंजी प्रवाह को बढ़ाना तथा घरेलू तरलता और रुपये पर दबाव को कम करना है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आरबीआई ने अपने व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण में बदलाव किया है और विकास दर के अनुमान को घटाया है, जबकि महंगाई के अनुमान को बढ़ाया गया है। वित्त वर्ष 2027 के लिए सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर का अनुमान 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया गया है।
महंगाई को लेकर रिपोर्ट में कहा गया है कि दूसरी छमाही में इसके बढ़ने का जोखिम है और यह औसतन 5.7 प्रतिशत तक रह सकती है, जबकि तीसरी तिमाही में यह 5.9 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, ये संकेत अर्थव्यवस्था में संभावित “मंदी के साथ महंगाई” जैसी स्थिति की ओर इशारा करते हैं, जिसे अर्थशास्त्र में स्टैगफ्लेशनरी जोखिम कहा जाता है। इसमें कहा गया है कि आरबीआई बढ़ती महंगाई और धीमी विकास दर के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है।
इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आई है, क्योंकि रुपये को स्थिर रखने के लिए बाजार में हस्तक्षेप किया गया है। रुपये में दबाव बढ़कर प्रति डॉलर लगभग 100 के स्तर के करीब पहुंचने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।
हालांकि रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया है कि ये कदम अल्पकालिक राहत दे सकते हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता होगी। केवल विदेशी पूंजी आकर्षित करने से टिकाऊ आर्थिक विकास संभव नहीं है, इसके लिए मजबूत आर्थिक सुधार और निवेशकों के भरोसे को बनाए रखना आवश्यक बताया गया है।












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