डेस्क : भारत में घरेलू विनिर्माण क्षमता को मजबूत करने के प्रयासों के सकारात्मक परिणाम दिखाई दे रहे हैं। बैंक ऑफ बड़ौदा के एक शोध प्रतिवेदन के अनुसार इलेक्ट्रिकल्स, रसायन, पूंजीगत वस्तुएँ और उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं जैसे प्रमुख क्षेत्रों में आयात पर निर्भरता में कमी दर्ज की गई है। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब पश्चिम एशिया में जारी संकट के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ दबाव में बनी हुई हैं।
प्रतिवेदन में कहा गया है कि यद्यपि समग्र स्तर पर कंपनियों की आयात निर्भरता का अनुपात लगभग स्थिर बना हुआ है, लेकिन क्षेत्रवार विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि जहाँ आयात पर निर्भरता अधिक थी, वहाँ धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की ओर बदलाव हुआ है। अध्ययन में १३७२ गैर-वित्तीय कंपनियों का विश्लेषण किया गया।
प्रतिवेदन के अनुसार वित्त वर्ष २५ में भारत की कुल आयात-से-शुद्ध बिक्री अनुपात २२.३ प्रतिशत रहा, जबकि वित्त वर्ष २०१९ में यह २२.९ प्रतिशत था। यानी कुल मिलाकर हल्की गिरावट दर्ज की गई है।
इलेक्ट्रिकल्स क्षेत्र में सबसे उल्लेखनीय सुधार देखा गया, जहाँ आयात-से-शुद्ध बिक्री अनुपात वित्त वर्ष २५ में घटकर १३.७ प्रतिशत रह गया, जो वित्त वर्ष २०१९ में २२.७ प्रतिशत था। इसी क्षेत्र में केबल सेगमेंट में यह अनुपात २१.८ प्रतिशत से घटकर १२.५ प्रतिशत पर आ गया। वहीं इलेक्ट्रॉनिक घटकों में भी कमी दर्ज हुई, जहाँ यह अनुपात ३१.५ प्रतिशत से घटकर २५.८ प्रतिशत हो गया।
रसायन क्षेत्र में भी आयात निर्भरता घटी है। यहाँ अनुपात वित्त वर्ष २५ में २२.५ प्रतिशत रहा, जबकि वित्त वर्ष २०१९ में यह २७.५ प्रतिशत था। विशेष रूप से कार्बन ब्लैक के क्षेत्र में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई, जहाँ यह ५५ प्रतिशत से घटकर ३५.६ प्रतिशत पर आ गया। कार्बन ब्लैक टायर निर्माण, प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक्स और बैटरी जैसे उद्योगों में महत्वपूर्ण मध्यवर्ती सामग्री के रूप में उपयोग होता है।
प्रतिवेदन में कहा गया है कि यह बदलाव सरकारी नीतिगत पहलों का परिणाम है, जिनका उद्देश्य घरेलू विनिर्माण को मजबूत करना और आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक लचीला बनाना है। इनमें मेक इन इंडिया, सेमीकंडक्टर मिशन २.०, इलेक्ट्रॉनिक घटक विनिर्माण योजना का विस्तार, रेयर अर्थ कॉरिडोर का विकास तथा रसायन पार्कों की स्थापना जैसी पहल शामिल हैं।
बैंक ऑफ बड़ौदा के अनुसार आयात निर्भरता में यह कमी भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान कर सकती है। प्रतिवेदन में कहा गया है कि भारत धीरे-धीरे आयात निर्भरता में संतुलित कमी की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिससे वैश्विक आपूर्ति में अचानक व्यवधान की स्थिति में घरेलू उत्पादन पर व्यापक प्रभाव पड़ने का जोखिम सीमित हो सकता है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पश्चिम एशिया संकट के बाद कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में ३१.१ प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके साथ ही कई औद्योगिक धातुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है, जिससे आयात-निर्भर उद्योगों की लागत बढ़ने की आशंका बनी हुई है।
हालांकि, प्रतिवेदन के अनुसार यह जोखिम समूची कॉरपोरेट अर्थव्यवस्था पर समान रूप से प्रभावी नहीं है, क्योंकि आयात निर्भरता कुछ ही क्षेत्रों में केंद्रित है। उपभोक्ता केंद्रित क्षेत्रों जैसे घरेलू उपकरण, स्वास्थ्य सेवाएँ, दैनिक उपभोग की वस्तुएँ और कृषि क्षेत्र अपेक्षाकृत कम प्रभावित हैं।
वहीं औद्योगिक गैस एवं ईंधन, अलौह धातुएँ, कच्चा तेल और गैस परिवहन जैसे क्षेत्र अभी भी अधिक आयात निर्भर बने हुए हैं और वैश्विक कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच उन पर विशेष निगरानी की आवश्यकता बताई गई है।












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