लाडनूं :जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगलवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘भवतृष्णा का छेदन करें’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि आगम में भवतृष्णा को भीतर में स्थित एक विषैली लता बताया गया है, जिसमें विषैले फल भी लगते हैं। तृष्णा एक प्यास है, जो अप्राप्त को पाने की इच्छा तृष्णा है। अप्राप्त को पाने की इच्छा होती है तो आदमी कुछ प्रयास भी करता है। इस बात को प्रशस्त और अप्रशस्त दोनों में रूपों में जाना जा सकता है।
अप्राप्त को प्राप्त करने की इच्छा प्रशस्त रूप में भी की जा सकती है। योगक्षेम वर्ष में यह बात प्रशस्त हो सकती है कि योग-साधना के द्वारा अब तक अप्राप्त को प्राप्त करने का प्रयास होता है। आगम का ज्ञान जो अब तक प्राप्त नहीं हुआ, उसे प्राप्त करने का प्रयास हो। तत्त्वज्ञान के जो ग्रंथ अभी नहीं तक नहीं पढ़ा, उसे पढ़ने का प्रयास हो। भिक्षु जश रसायण भी मानों कितना अच्छा ग्रंथ प्राप्त हो सकता है। कितने-कितने ग्रंथ हैं, जिन्हें पढ़ने व स्वाध्याय करने की इच्छा रखी जा सकती है। इसे प्रशस्त इच्छा के रूप में देखा जा सकता है। सेवा की भावना भी एक प्रशस्त इच्छा होती है। अप्रशस्त इच्छाएं भी हो सकती हैं। भौतिक कामनाओं के माध्यम से भौतिक चीजों को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा अप्रशस्त इच्छा हो सकती है।
आगम में कहा गया है कि ये अप्रशस्त कोटि की तृष्णाएं होती हैं, जो संसार के प्रति आकर्षित करती हैं। भौतिक कामनाओं, लालसाएं भीतर में रहने वाली विषतुल्य लता है और इसके विषतुल्य फल भी लगते हैं। लोभ भीतर में होता है तो अनेक रूपों में तृष्णा व कामनाएं उत्पन्न होती रहती हैं। जिनके कारण आदमी दुःखी होता रहता है। दुःख का एक मूल कारण भीतर में रहने वाली तृष्णा की भावना ही है। आदमी में संतोष का भाव जाग जाए तो फिर उसे जो सुख मिल सकता है। इससे कितनी शांति रह सकती है। जब आदमी के पास संतोष रूपी धन आ जाता है तो सारे धन धूल के समान हो जाते हैं।
गृहस्थों में तृष्णा, लालसा की तो मानों अधिकता ही कही जा सकती है। हालांकि कई-कई गृहस्थ भी बहुत संयमी हो सकते हैं। वे कई भिक्षुओं से ज्यादा संयम की चेतना वाले भी हो सकते हैं। वे गृहवास में रहते हुए भी कुछ अंशों में संत जैसे होते हैं। गृहस्थों में इच्छाओं का संयम करने के लिए श्रावक के बारह व्रतों एक व्रत है- इच्छा परिमाण व्रत। अपनी इच्छाओं, लालसाओं को कम करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी जो भी व्यापार आदि कार्य करे, उसमें ईमानदारी रखने का प्रयास करना चाहिए।
आदमी के जीवन में जितनी ईमानदारी होती है तो मानना चाहिए कि उसके जीवन में तृष्णा का कुछ अभाव है। सबके लिए साधु बनना आसान नहीं भी हो सकता है, किन्तु गृहस्थ जीवन को भी अच्छा बनाने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार आदमी को इस भवतृष्णा का जितना संभव हो सके, करते रहने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को उत्तरित किया। जिज्ञासा-समाधान का क्रम चारित्रात्माओं को ही नहीं, उपस्थित गृहस्थों के जीवन के कई जिज्ञासाओं को समाहित करने वाला सिद्ध हो रहा है।













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