डेस्क : देश में डिजिटल भुगतान के लोकप्रिय माध्यम यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि कारोबारियों को यूपीआई के जरिए भुगतान की सुविधा हमेशा मुफ्त रखने का कोई स्थायी आश्वासन नहीं दिया गया था। सरकार ने 2,000 रुपये से अधिक के कुछ कारोबारी लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने की प्रस्तावित व्यवस्था का बचाव किया है।
केंद्र सरकार ने 4 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाबी हलफनामे में कहा कि शून्य एमडीआर की व्यवस्था को अनिश्चितकाल तक जारी रखने की कोई बाध्यता नहीं है। सरकार के अनुसार, इस व्यवस्था को बदलने पर काफी पहले से विचार किया जा रहा था और अंतिम निर्णय लेने से पहले संबंधित पक्षों से चर्चा भी की गई थी। सरकार ने यह भी कहा कि शून्य एमडीआर व्यवस्था के लिए दी जाने वाली सब्सिडी अनिवार्य नहीं, बल्कि सरकार के विवेक पर निर्भर थी।
यह जवाब वकील अंजन दत्ता की ओर से दाखिल जनहित याचिका के संदर्भ में आया है। याचिका में संशोधित एमडीआर व्यवस्था को चुनौती देते हुए इसे कारोबारियों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया गया है।
2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर लग सकता है शुल्क
केंद्र सरकार ने 2,000 रुपये की सीमा को उचित ठहराते हुए कहा कि इसका उद्देश्य छोटे कारोबारियों और सामान्य खुदरा लेनदेन को अतिरिक्त आर्थिक बोझ से बचाना है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले यूपीआई लेनदेन पर किसी भी राशि के लिए शुल्क नहीं लगेगा। वहीं, व्यक्ति से व्यापारी को 2,000 रुपये तक किए जाने वाले भुगतान भी एमडीआर से मुक्त रहेंगे।
सरकार का तर्क है कि अधिक राशि के लेनदेन करने वाले कारोबारी मामूली शुल्क वहन करने की बेहतर स्थिति में हैं। सरकार ने स्पष्ट किया कि एमडीआर कोई सरकारी टैक्स या फीस नहीं है, बल्कि भुगतान प्रक्रिया से जुड़ा व्यावसायिक शुल्क है, जिसे व्यापारी के खाते में भुगतान की जाने वाली राशि से काटा जाता है।
मुफ्त भुगतान व्यवस्था पर खर्च हुए 8,730 करोड़ रुपये
सरकार ने मुफ्त डिजिटल भुगतान व्यवस्था की आर्थिक लागत का हवाला देते हुए बताया कि वित्त वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच शून्य एमडीआर व्यवस्था को समर्थन देने के लिए बैंकों को 8,730 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन दिए गए।
हालांकि, सरकार के अनुसार यह राशि यूपीआई व्यवस्था की अनुमानित सालाना परिचालन लागत के मुकाबले काफी कम थी। इस लागत का अनुमान करीब 20,700 करोड़ रुपये लगाया गया है। केंद्र का कहना है कि डिजिटल भुगतान प्रणाली को लंबे समय तक सुचारु बनाए रखने के लिए स्थायी वित्तीय मॉडल जरूरी है। इससे साइबर सुरक्षा, ऑनलाइन धोखाधड़ी की रोकथाम, शिकायतों के निपटारे और तकनीकी ढांचे के विकास में निवेश किया जा सकेगा।
96 प्रतिशत कारोबारी लेनदेन पर नहीं पड़ेगा असर
सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि संशोधित व्यवस्था से यूपीआई के अधिकांश लेनदेन प्रभावित नहीं होंगे। व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले सभी भुगतान पहले की तरह मुफ्त रहेंगे। इसके अलावा 2,000 रुपये तक के कारोबारी भुगतान पर भी कोई एमडीआर नहीं लगेगा।
यूपीआई क्यूआर कोड के माध्यम से हर महीने एक लाख रुपये तक प्राप्त करने वाले पात्र छोटे कारोबारियों को भी शुल्क से छूट दी गई है। सरकार के मुताबिक, करीब 96 प्रतिशत मर्चेंट लेनदेन इस व्यवस्था से अप्रभावित रहेंगे। साथ ही कारोबारियों को एमडीआर का बोझ ग्राहकों पर डालने की अनुमति नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला?
यूपीआई पर संशोधित एमडीआर व्यवस्था को वकील अंजन दत्ता ने जनहित याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में दलील दी गई है कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(जी) के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन करती है।
सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए संशोधित व्यवस्था पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया था। हालांकि, अदालत ने केंद्र सरकार और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) से जवाब मांगा था।
इसके बाद 3 नवंबर को एनपीसीआई ने भी सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल किया। एनपीसीआई ने प्रस्तावित शुल्क व्यवस्था का बचाव करते हुए कहा कि इससे करीब 96 प्रतिशत कारोबारी यूपीआई लेनदेन प्रभावित नहीं होंगे। संशोधित व्यवस्था को शुरुआत में 15 अक्टूबर 2026 से लागू किया जाना था, लेकिन एनपीसीआई ने इसके क्रियान्वयन को फिलहाल आगे टाल दिया है।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आगामी रुख पर डिजिटल भुगतान करने वाले कारोबारियों और आम उपभोक्ताओं की नजर रहेगी।













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