डेस्क : पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को लेकर तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगान को अपने ही देश में विरोध का सामना करना पड़ रहा है। तुर्किए की संसद में विपक्षी सांसदों ने सवाल उठाया है कि यदि भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है और पाकिस्तान सैन्य मदद मांगता है, तो क्या तुर्किए भी इस संघर्ष में शामिल होगा?
दरअसल, तुर्किए की संसद ने गुरुवार को मक्का रक्षा समझौते को 279 वोटों के समर्थन से मंजूरी दे दी। वहीं, 119 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया। इस समझौते के तहत किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। यही प्रावधान अब तुर्किए की घरेलू राजनीति में बहस का विषय बन गया है।
विपक्षी सांसद ने उठाया भारत-पाकिस्तान युद्ध का सवाल
तुर्किए की विपक्षी सांसद गुलिस्तान किलिक कोसीगिट ने संसद में समझौते को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि यदि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है और पाकिस्तान तुर्किए से मदद मांगता है, तो सरकार क्या फैसला करेगी?
उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और दोनों देशों की परमाणु क्षमताओं का भी जिक्र किया। उनका सवाल था कि आखिर यह फैसला कौन करेगा कि तुर्किए को किसी ऐसे युद्ध में शामिल होना चाहिए या नहीं, जिसे शुरू करने में उसकी कोई भूमिका नहीं है।
विपक्ष का मानना है कि इस समझौते के कारण तुर्किए भविष्य में ऐसे सैन्य संघर्ष में उलझ सकता है, जिसका उसके राष्ट्रीय हितों से सीधा संबंध नहीं होगा।
एर्दोगान सरकार ने क्या दिया जवाब?
विपक्ष के सवालों पर एर्दोगान सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया कि समझौते का अर्थ यह नहीं है कि तुर्किए को किसी भी परिस्थिति में अपनी सेना दूसरे देश में भेजनी ही होगी।
संसद की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष फुआत ओकताय ने कहा कि तुर्किए को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी अनियंत्रित युद्ध में नहीं धकेला जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि सैनिकों की तैनाती के लिए संसद की अलग से मंजूरी आवश्यक होगी।
इसका मतलब है कि रक्षा समझौते की मंजूरी के बावजूद तुर्किए की सेना की तैनाती स्वतः नहीं होगी। हालांकि, सैन्य सहयोग, खुफिया जानकारी साझा करने और रक्षा तकनीक के आदान-प्रदान जैसे विकल्प समझौते का हिस्सा हैं।
क्या है मक्का रक्षा समझौता?
तुर्किए, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच अगस्त 2026 में मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते का प्रमुख प्रावधान है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला अन्य सदस्य देशों के खिलाफ हमला माना जाएगा।
समझौते का उद्देश्य तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, सैन्य समन्वय, खुफिया जानकारी साझा करने और रक्षा उद्योग को मजबूत करना है। इसे सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है।
इस समझौते को लेकर आलोचकों ने इसे संभावित इस्लामिक सैन्य गठबंधन के रूप में भी देखा है। हालांकि, संबंधित देशों की सरकारों का कहना है कि यह समझौता रक्षात्मक प्रकृति का है और किसी तीसरे देश को निशाना बनाने के लिए नहीं किया गया है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम?
भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से ही संवेदनशील संबंध रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान के साथ तुर्किए और सऊदी अरब का रक्षा समझौता दक्षिण एशिया की सुरक्षा परिस्थितियों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि भविष्य में यदि भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव बढ़ता है, तो मक्का समझौते की व्यावहारिक भूमिका क्या होगी?
फिलहाल तुर्किए की संसद में उठे सवाल इस बात का संकेत हैं कि समझौते को लेकर वहां भी सभी राजनीतिक दल एकमत नहीं हैं। हालांकि, यह स्पष्ट है कि समझौते की मंजूरी का अर्थ भारत-पाकिस्तान युद्ध की स्थिति में तुर्किए की स्वतः सैन्य भागीदारी नहीं है। वास्तविक स्थिति भविष्य में सामने आने वाली परिस्थितियों और तुर्किए की संसद के फैसलों पर निर्भर करेगी।













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