डेस्क: केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के बीच अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर सोशल मीडिया पर विवाद गरमा गया है। रिजिजू ने एक इंटरव्यू में कहा था कि भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों की तुलना में ज्यादा लाभ और सुरक्षा मिलती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य पड़ोसी देशों की ओर पलायन नहीं करते। हालांकि, उन्होंने किसी समुदाय का नाम नहीं लिया था।
इस बयान पर ओवैसी भड़क उठे और उन्होंने सोशल मीडिया पर जवाब देते हुए कहा कि रिजिजू भारत के मंत्री हैं, राजा नहीं। उन्होंने सवाल उठाए कि क्या रोजाना मुसलमानों को “पाकिस्तानी”, “जिहादी” जैसे नाम से पुकारना, लिंचिंग का शिकार बनना या घरों और मस्जिदों पर बुलडोजर चलाना अल्पसंख्यकों को मिलने वाला “लाभ” और “सुरक्षा” है? ओवैसी ने यह भी कहा कि मुसलमान अब दूसरे दर्जे के नागरिक हैं और अल्पसंख्यक अधिकार मौलिक अधिकार हैं, दान नहीं।
ओवैसी ने किरेन रिजिजू के मंत्रालय की नीतियों पर भी निशाना साधा और कहा कि मुस्लिम छात्रों के लिए मिलने वाली छात्रवृत्तियां बंद या सीमित कर दी गई हैं। उन्होंने बताया कि मुसलमानों की संख्या उच्च शिक्षा में घट रही है, जबकि आर्थिक क्षेत्र में उनकी उपस्थिति बढ़ रही है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि मुस्लिम-केंद्रित क्षेत्र बुनियादी ढांचे और सेवाओं से सबसे ज्यादा वंचित हैं। ओवैसी ने स्पष्ट किया कि वे सिर्फ संविधान में दिए गए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की मांग कर रहे हैं।
इस पर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने पलटवार किया और कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की कल्याणकारी योजनाएं सभी के लिए हैं। उन्होंने दावा किया कि अल्पसंख्यकों को अतिरिक्त लाभ दिए जा रहे हैं और पिछले 11 वर्षों से “सबका साथ, सबका विकास” के सिद्धांत को सरकार ने लागू किया है।
यह विवाद सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैल गया है और दोनों नेताओं के समर्थक अपनी-अपनी बातों पर अड़े हुए हैं।













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