लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने रविवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को अपने नित्य प्रति होने वाले प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में आज के निर्धारित विषय ‘उपयोगपूर्वक चलें’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि जैन विद्या में उपयोग लक्षण बताया गया है। जीव का लक्षण ही उपयोग बताया गया है। बारह उपयोग बताए गए हैं- पांच ज्ञान, तीन अज्ञान और चार दर्शन। उपयोग के दो भेद भी किए गए हैं-साकार उपयोग और अनाकार उपयोग। सामान्य अवबोध में दर्शन और विशेष अवबोध में ज्ञान आ जाता है।
पर्याय का ग्राही होने से ज्ञान साकार होता है। ज्ञानावरणीय कर्म और दर्शनावरणीय कर्म होते हैं। इनमें ज्ञानावरणीय कर्म है जो विशेष ज्ञान पर आवरण डालने वाला होता है। दर्शनावरणीय कर्म सामान्य अवबोध पर आवरण डालने वाला होता है। जैन विद्या अज्ञान के विषय में बताया गया है कि अज्ञान दो प्रकार के होते हैं। ज्ञान के अभाव वाला अज्ञान ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से निष्पन्न होता है। जब तक केवल ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो जाती, तब यह अज्ञान किसी न किसी रूप में बना ही रहता है। दूसरे अज्ञान के संदर्भ में बताया गया कि वह अभाव रूप में नहीं है। मिथ्यात्वी का ज्ञान क्षायोपशमिक भाव होता है। कहा जा सकता है कि अज्ञान ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से और ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से भी अज्ञान होता है। ज्ञान का अभाव ज्ञानावरणीय कर्म के उदय का भाव है और ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से होने वाला अज्ञान मति श्रुत विभंग अज्ञान होता है। यह मिथ्यात्वी जीव के पास होता है तो उसकी संज्ञा अज्ञान है।
चेतना की प्रवृत्ति उपयोग होता है। शास्त्र में कहा गया है कि साधु उपयोगपूर्वक चले। चलने के संदर्भ मंे चार प्रकार की यतना आगम में बताई गई है-द्रव्यतः, क्षेत्रतः, कालतः व भावतः। आंखों से देख-देखकर चलना द्रव्यतः यतना होती है। आंखों का उपयोग चलने में करना चाहिए। जितना जीव-जन्तु दिख जाता है तो उससे बचाव भी हो सकता है। वैसे साधु को रजोहरण भी साथ रखने का प्रयास करना चाहिए। शरीर प्रमाण भूमि को देखकर चलना क्षेत्रतः यतना होती है। जब तक साधु चले, तब तक देखना कालतः यतना होती है। चलने में एकाग्रचित्त होकर चलना, उपयुक्त होकर चलना भावतः यतना होती है।
चलने में जागरूकता रखने का प्रयास करना चाहिए। ज्यादा इधर-उधर देखते हुए चलना अच्छी बात नहीं। कुछ सुनते-सुनते चलना भी अच्छा नहीं होता। चलने में ईर्या समिति का ध्यान रखने का प्रयास होना चाहिए। चलने में चलना ही प्रधान होना चाहिए, और सुनना गौण होना चाहिए। किसी से कोई बात करनी है तो थोड़ा ठहर कर भी बात की जा सकती है। इससे ईर्या समिति में बाधा नहीं आती। इन्द्रिय विषयों का वर्जन करते हुए आदमी को चलने का प्रयास करना चाहिए। चलते-चलते न ही खाना चाहिए और न ही पीना चाहिए। उपयुक्त होने के लिए इन्द्रिय विषयों का वर्जन करना होता है। इसलिए साधु को ही नहीं, गृहस्थ को भी उपयुक्त होकर चलना चाहिए। आगम के हिसाब से चला जाए तो चलना भी साधना हो सकती है। ईर्या समिति के साथ वाहन और ट्रैफिक का ध्यान भी आवश्यक होता है। अपनी ओर से पूर्ण सावधानी रखने का प्रयास करना चाहिए और ईर्या समिति में जागरूकता रखनी चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हजारी के संदर्भ में चारित्रात्माओं को विविध प्रेरणाएं प्रदान करते हुए हाजरी का वाचन किया। आचार्यश्री की अनुज्ञा से साध्वी पद्मप्रभाजी ने लेखपत्र उच्चरित किया। आचार्यश्री ने उन्हें पांच कल्याणक बक्सीस किए। तदुपरान्त उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र को उच्चरित किया।
आज कार्यक्रम में जैन विश्व भारती द्वारा आचार्यश्री की कृति क्या कहता है जैन वाङ्मय की साध्वी चारित्रयशाजी द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवादित पुस्तक को आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया गया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। आचार्यश्री ने प्रेक्षाध्यान शिविर में भाग लेने वाले शिविरार्थियों को शिविर की उपसंपदा प्रदान की।













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