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Home राज्य-शहर एनसीआर

केजरीवाल के खिलाफ CBI का ऐक्शन ED केस से कैसे अलग, रिहाई पर कितना असर?

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
June 26, 2024
in एनसीआर
Reading Time: 1 min read
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आम आदमी पार्टी अब आरोपी नंबर 38

File Photo

नई दिल्ली।सीबीआई ने दिल्ली के कथित शराब घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को औपचारिक रूप से गिरफ्तार करते हुए कोर्ट से उनकी पांच दिन की रिमांड मांगी। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, सीबीआई ने विशेष न्यायाधीश अमिताभ रावत से अनुमति लेकर केजरीवाल को गिरफ्तार किया। सीबीआई ने इस तथाकथित घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में जमानत दिए जाने के मसले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले यह कदम उठाया है।

CBI के ऐक्शन के बाद सवाल
बड़ा सवाल यह कि सीबीआई की ओर से की गई इस गिरफ्तारी का इस पूरे प्रकरण पर क्या असर पड़ेगा। खासतौर पर केजरीवाल की रिहाई पर सीबीआई के ऐक्शन का क्या असर पड़ेगा? इस रिपोर्ट में यह भी जानेंगे कि दिल्ली के कथित शराब घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई की जांच किस तरह से ईडी की जांच से अलग है?

CBI की जांच ईडी के मामले से कैसे अलग?
‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ईडी दिल्ली के कथित शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच कर रहा है। इसमें ईडी कथित रिश्वत के लेन-देन की पड़ताल कर रहा है। केजरीवाल पर कथित रकम का बंदोबस्त करने के साथ उसका इस्तेमाल करने का आरोप है। वहीं सीबीआई यह जांच कर रही है कि मामले में भ्रष्टाचार हुआ। सीबीआई के सामने कथित रिश्वत के लेन-देन को साबित करने की चुनौती है।

क्या कहती है पीएमएलए की धारा-3 
भ्रष्टाचार के मामलों में पीएमएलए की धारा 3 बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। इसके तहत जांच में मिले सबूतों से भ्रष्टाचार को स्थापित करना आसान हो जाता है। यह मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (को अपराध बनाती है। इसमें अवैध रकम को छिपाना, उसे हासिल करना, उसका इस्तेमाल करना, काले पैसे को बेदाग संपत्ति के रूप में दिखाना शामिल है। इसमें अवैध या रिश्वत की रकम या ब्लैक मनी को बेदाग संपत्ति के रूप में बताना अपराध की श्रेणी में आता है।

AAP ने बताया साजिश
सीबीआई ने इस मामले में साल 2022 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसी एक्ट) के तहत केस दर्ज किया था। गौर करने वाली बात यह कि सीबीआई ने केजरीवाल को अब तक भ्रष्टाचार के इस मामले में आरोपी के तौर पर नामजद नहीं किया है। सीबीआई ने अप्रैल में केजरीवाल को पूछताछ के लिए बुलाया था। उनके वकीलों ने तब अदालत में कहा था कि उन्हें एक गवाह के तौर पर बुलाया गया था न कि एक आरोपी के रूप में… अब जब सीबीआई ने दोबारा पूछताछ की शुरुआत की है तब AAP ने इसे केजरीवाल को जेल में रखने की साजिश करार दिया है।

पहले गिरफ्तार क्यों नहीं किया?
आम आदमी पार्टी के इन आरोपों के मद्देनजर देखें तो सवाल लाजिम है कि सीबीआई ने अरविंद केजरीवाल को पहले गिरफ्तार क्यों नहीं किया? ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट कहती है कि सीबीआई के पास पहले भी केजरीवाल को गिरफ्तार करने का विकल्प था, लेकिन इसके लिए उसे कथित घोटाले में केजरीवाल को जोड़ने वाले कुछ विश्वसनीय सबूत जुटाने की जरूरत होगी क्योंकि बिना सबूतों के अदालत में टिके रहना एक बड़ी चुनौती होगी।

दोनों मामले में जमानत कितनी चुनौतीपूर्ण?
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में ईडी ने केजरीवाल पर दो तरह से शिकंजा कसा है। ईडी ने कथित अवैध फंड से जोड़ने के लिए केजरीवाल को दिल्ली के मुख्यमंत्री और AAP के संयोजक दोनों रूपों में जिम्मेदार ठहराया है। कानून के जानकारों की मानें तो भ्रष्टाचार के मामले ठोस सबूत की जरूरत होती है। ऐसे में सीबीआई के पास ऐसा विकल्प नहीं था। यही नहीं पीएमएलए के आरोप में जमानत देने का मानदंड ऊंचा है, इसलिए ईडी को आरोपी को लंबी हिरासत में रखने की अनुमति मिलती जाती है।

भ्रष्टाचार के मामलों में जमानत कितनी पेचीदा?
मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध में कानून काफी सख्त है। वहीं भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपियों को जमानत लेने के लिए अपेक्षाकृत अधिक विकल्प मिल जाते हैं। आरोपी ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत के लिए भी अदालतों से गुहार लगा सकता है। हालांकि गैर-जमानती अपराधों में जमानत देना न्यायिक विवेक के अधीन होता है। पीएमएलए कानून की तुलना में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम यानी पीसी एक्ट जमानत के लिए कठोर योग्यताएं लागू नहीं करता है।

पीसी एक्ट में जमानत पर क्या है सुप्रीम कोर्ट की राय?
सुप्रीम कोर्ट ने साल 2019 में आईएनएक्स मीडिया मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम को जमानत प्रदान की थी। इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने उन बिंदुओं का जिक्र किया जिन पर पीसी एक्ट के मामलों में जमानत देते वक्त ध्यान में रखना चाहिए। इनमें आरोप की प्रकृति, सजा की गंभीरता, अभियोजन पक्ष के सबूतों की प्रकृति, गवाहों को प्रभावित करने या उनको खतरे की आशंका, आरोपी के फरार होने की संभावना, आरोपी का चरित्र, राज्य और जनता का हित शामिल हैं।

Tags: अरविंद केजरीवाल
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