डेस्क: नासा के मार्स रोवर परसिवरेंस ने मंगल ग्रह की एक सूखी नदी-धारा में ऐसे चट्टानों का पता लगाया है जिनमें अरबों साल पहले सूक्ष्म जीवों (माइक्रोबियल लाइफ) के संभावित संकेत छिपे हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज बेहद रोमांचक है, लेकिन इसके निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले धरती पर गहन प्रयोगशाला विश्लेषण की आवश्यकता होगी।
साल 2021 से मंगल की सतह पर घूम रहा यह रोवर सीधे जीवन का पता लगाने में सक्षम नहीं है। इसके बजाय इसमें ड्रिल और सैंपल ट्यूब लगे हैं, जिनके जरिये वह उन चट्टानों और मिट्टी के नमूनों को इकट्ठा करता है जिन्हें जीवन की उपस्थिति के लिहाज से सबसे उपयुक्त माना जाता है। अब तक परसिवरेंस 30 नमूने इकट्ठा कर चुका है।
यह ताजा नमूना नेरेट्वा वैलिस नामक नदी-मार्ग से लिया गया है, जो कभी जेज़ेरो क्रेटर में पानी लाया करता था। यह नमूना ब्राइट एंजल फॉर्मेशन नामक तलछटी चट्टान से लिया गया, जो लाल रंग की, चिकनी मिट्टी से भरपूर है। अध्ययन में इसमें ऑर्गेनिक कार्बन (जीवन की बुनियादी इकाई) के साथ लौह-फॉस्फेट और लौह-सल्फाइड के कण मिले हैं। धरती पर ये यौगिक अक्सर सूक्ष्मजीवों द्वारा कार्बनिक पदार्थों को तोड़ने पर बनते हैं।
स्टोनी ब्रूक यूनिवर्सिटी के प्रमुख शोधकर्ता जोएल हुरोविट्ज़ का कहना है—
“हम यह तो नहीं कह सकते कि यह जीवन का पक्का प्रमाण है, लेकिन यह जरूर कह सकते हैं कि सूक्ष्म जीवन इसकी एक संभावित व्याख्या हो सकती है। अन्य प्राकृतिक प्रक्रियाएँ भी यह संरचना बना सकती हैं।”
सेटी इंस्टीट्यूट की जैनिस बिशप और यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट के मारियो पैरेंटे, जो अध्ययन में शामिल नहीं थे, उन्होंने भी चेतावनी दी कि इन चिह्नों के पीछे गैर-जैविक कारण भी हो सकते हैं।
परसिवरेंस ने अब तक 25 ड्रिलिंग के जरिये सैंपल जुटाए हैं। दस टाइटेनियम ट्यूबों को कुछ साल पहले बैकअप के तौर पर मंगल की सतह पर भी रखा गया था। नासा की योजना थी कि 2030 के शुरुआती वर्षों में ये नमूने धरती पर लाए जाएंगे, लेकिन लागत 11 अरब डॉलर तक पहुँचने से मिशन फिलहाल ठहर गया है और अब इसकी समयसीमा 2040 के दशक तक खिंच सकती है।
वैज्ञानिक मानते हैं कि मंगल पर इस तरह के यौगिकों का मिलना अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि धरती पर अंटार्कटिक झीलों में सूक्ष्मजीव इसी प्रकार खनिजों से परस्पर क्रिया करते हैं। बिशप और पैरेंटे ने अपने संपादकीय में लिखा—
“आज मंगल पर जीवन का कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन अगर कभी वहाँ सूक्ष्मजीव रहे होंगे तो संभव है कि उन्होंने जेज़ेरो क्रेटर जैसी झीलों में सल्फेट खनिजों को घटाकर सल्फाइड बनाए हों।”
यह शोध प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुआ है।













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