भारतीय परंपरा में कुछ तिथियाँ केवल पर्व नहीं होतीं, वे स्मृति होती हैं—सभ्यता की, चेतना की और आत्मा के संस्कारों की। सीता अष्टमी ऐसी ही एक तिथि है। यह केवल जनकनंदिनी सीता के प्राकट्य का उत्सव नहीं, बल्कि उस स्त्री चेतना का स्मरण है जिसने शक्ति को मौन में, सहनशीलता को आत्मसम्मान में और संस्कारों को आचरण में ढालकर जीवन जिया।
सीता को प्रायः सहनशीलता का पर्याय मान लिया गया है, पर यह समझ अधूरी है। सहनशीलता यदि मजबूरी हो, तो वह दुर्बलता है; और यदि आत्मबल से उपजी हो, तो वही शक्ति बन जाती है। सीता की सहनशीलता इसी दूसरे स्वरूप की थी। वनवास, अपहरण, अशोक वाटिका का एकांत, अग्नि परीक्षा—ये सब केवल कष्टों की सूची नहीं हैं, बल्कि उस आंतरिक सामर्थ्य के प्रमाण हैं जो किसी भी परिस्थिति में अपने मूल्यों से विचलित नहीं होती।
सीता की शक्ति शस्त्रों में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास में थी। रावण के वैभव और भय के सामने उनका अविचल रहना, किसी भी युद्ध से कम साहसिक नहीं था। अशोक वाटिका में बंदी रहते हुए भी उन्होंने अपने चरित्र, अपनी मर्यादा और अपने विश्वास से समझौता नहीं किया। यह वह शक्ति है जो बाहरी परिस्थितियों से नहीं, भीतर की दृढ़ता से जन्म लेती है।
सीता अष्टमी हमें यह भी याद दिलाती है कि संस्कार केवल उपदेश नहीं होते, वे जीवन पद्धति होते हैं। सीता के संस्कार उनके व्यवहार में दिखाई देते हैं—पिता के प्रति आदर, पति के साथ सहभागिता, प्रकृति के प्रति संवेदना और समाज के प्रति उत्तरदायित्व। धरतीपुत्री सीता का प्रकृति से जुड़ाव केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि उस संतुलन का संकेत है जिसमें मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक होते हैं।
आज के समय में, जब शक्ति को अक्सर आक्रामकता और सहनशीलता को कमजोरी समझ लिया जाता है, सीता अष्टमी का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व सिखाता है कि सच्ची शक्ति संयम में है, सच्ची सहनशीलता आत्मसम्मान से जुड़ी है और सच्चे संस्कार वही हैं जो कठिन समय में भी मनुष्य को मनुष्य बनाए रखें।
सीता अष्टमी केवल अतीत की पूजा नहीं, वर्तमान से संवाद है। यह प्रश्न करती है—क्या हमने शक्ति का अर्थ सही समझा? क्या हमारी सहनशीलता आत्मबल से उपजी है या भय से? और क्या हमारे संस्कार केवल परंपरा तक सीमित हैं या जीवन में उतर पाए हैं?
इस पर्व पर सीता को केवल पूज्य देवी के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत आदर्श के रूप में देखने की आवश्यकता है। ऐसी स्त्री के रूप में, जो चुप रही, पर कमजोर नहीं थी; जिसने सहा, पर झुकी नहीं; और जिसने संस्कारों को बोझ नहीं, बल्कि अपनी शक्ति बनाया।
सीता अष्टमी, वास्तव में, उसी चेतना का उत्सव है—जहाँ शक्ति, सहनशीलता और संस्कार एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के तीन आयाम हैं।













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