जयपुर :आचार्य श्री महाश्रमण जी महाराज के त्रिदिवसीय पाटोत्सव कार्यक्रम के अंतिम दिन आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री तत्व रुचि जी “तरुण” ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन और आत्मविकास का प्रेरक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री महाश्रमण जी कलयुग में सतयुग के अवतार समान हैं। उन्हें स्वाभाविक रूप से अनेक ऋद्धियां, सिद्धियां एवं अतीन्द्रिय लब्धियां प्राप्त हैं, किन्तु वे कभी उनका प्रदर्शन नहीं करते। समय-समय पर उनके कार्यों से इन दिव्य गुणों की झलक अवश्य दिखाई देती है।
मुनि श्री ने आगम सूत्रों का उच्चारण करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन स्वयं से तीन प्रश्न अवश्य पूछने चाहिए—मैंने आज क्या किया? मेरे लिए अभी क्या करना शेष है? और ऐसा क्या है, जिसे मैं कर सकता हूँ, किन्तु प्रमाद और आलस्य के कारण नहीं कर रहा हूँ? उन्होंने कहा कि यदि इन प्रश्नों के उत्तर व्यक्ति अपनी अंतरात्मा से खोजे, तो उसके सर्वांगीण विकास का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो सकता है।
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने आचार्य महाश्रमण जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे ऋजुता, मृदुता, विनम्रता, समता, सहनशीलता, श्रमपरायणता, करुणा और संवेदनशीलता के जीवंत प्रतिरूप हैं। उनकी त्यागमयी तपस्या, संयमपूर्ण साधना और अनुकरणीय जीवनशैली अद्वितीय है। उन्होंने कहा कि यह वसुंधरा ऐसे तपःपूत महापुरुषों के कारण ही सुरक्षित और पावन बनी हुई है।
कार्यक्रम में तेरापंथ महिला मंडल सी-स्कीम की अध्यक्षा श्रीमती कनक जी आंचलिया, श्रीमती विभा जी सुराना (विशाखापट्टनम) तथा श्रीमती सरिता जी आंचलिया सहित अन्य श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री महाश्रमण जी के प्रति श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए भक्ति गीतों की मनोहारी प्रस्तुति दी।
धर्मसभा का शुभारंभ तीर्थंकर विमल प्रभु की स्तुति से हुआ तथा मंगल पाठ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।













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