-कालूयशोविलास के आख्यान को भी आचार्यश्री ने किया प्रारम्भ
घोड़बंदर, मुम्बई (महाराष्ट्र) : सवाया चतुर्मास का सौभाग्य प्राप्त कर मुम्बई की जनता आह्लादित है। 68 वर्षों के बाद सवाये चतुर्मास का सवाया लाभ उठाने के लिए श्रद्धालु उत्साहित हैं तो जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी भी श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक और धार्मिक ज्ञान का सवाया लाभ प्रदान करने के लिए बुधवार से प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में 32 जैन आगमों में सबसे बड़े ग्रन्थ भगवती सूत्र पर आधारित मंगल प्रवचन का क्रम प्रारम्भ किया तो वहीं श्रद्धालुओं को अमृतपान कराने के लिए ‘कालूयशोविलास’ की आख्यान माला भी आरम्भ की। अपने आराध्य के श्रीमुख से आगम की प्रेरणा और विशेष आख्यान का श्रवण कर श्रद्धालु जनता भावविभोर हो उठी।
बुधवार को तीर्थंकर समवसरण में उपस्थित भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने भगवती सूत्राधारित अपने पावन प्रवचन में कहा कि हमारी जैन परंपरा में 32 आगम मान्य हैं, जिनमें भगवती सूत्र सबसे बड़ा आगम है। और भी ज्यादा आगमों की बात होती है, किन्तु प्रमाण के तौर पर 32 आगम ही मुख्य हैं। इन 32 आगमों में भी 11 अंग आगम स्वतः प्रमाण के रूप में हैं। आगमों की मूल भाषा प्राकृत अथवा अर्धमागधि है, जो वर्तमान में जनमानस की भाषा में नहीं है, इसलिए आम लोगों के लिए यह सुगम भी नहीं है। परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी की आज्ञा ने आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने जैन आगम आचारांग पर संस्कृत भाषा में भाष्य लिखा है। मुझे भी उसे लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी बोलते और उसे लिखता।
मूल 11 अंग आगमों में पांचवां और सबसे बड़ा आगम है भगवई बिआहपण्णत्ती, इसे छोटे रूप में भगवती सूत्र भी कहते हैं। इसे पढ़ने से विभिन्न विषयों का ज्ञान होता है। इसमें भगवान महावीर ने बताया है कि शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श का सेवन आदमी की पांचों इन्द्रियों द्वारा होता है। शब्द श्रोत्रेन्द्रिय से, रूप चक्षुरेन्द्रिय से, रस रसनेन्द्रिय से, गंध घ्राणेन्द्रिय से और स्पर्श स्पर्शनेन्द्रिय से। इन पांचों को भी दो भागों में विभक्त किया गया है। शब्द और रूप को काम कहा गया है और रस, गंध और स्पर्श को भोग कहा गया है। इसका आधार यह है कि शब्द को सुनकर जाना जाता है, और रूप को आंखों से देखा जा सकता है, यह दूर से प्राप्त होता है, इसलिए इसे काम कहा गया। रस का पता तब चलता है, जब वह जिह्वा पर जाता है, गंध भी जब नाक में जाती है तो गंध अथवा दुर्गंध का पता चल पाता है, उसी प्रकार स्पर्श भी जब छुआ जाए तो पता चलता है, इसलिए इन्हें भोग कहा गया है। अर्थात जिन विषयों की कामना की जाए और संवेदन न हो उन्हें काम और जिन विषयों का संवेदन भी हो वह भोग होता है। रस, गंध और स्पर्श को इन्द्रियों से भोग किया जाता है।
जीव कामी भी होते हैं और भोगी भी होते हैं। मनुष्य कामी और भोगी होता है। आदमी को अपने जीवन में यह प्रयास करना चाहिए कि इन्द्रियों का अनावश्यक उपयोग न हो। काम और भोग में संयम करने का भाव होना चाहिए। संयम की चेतना पुष्ट रहती है तो काम और भोग पर नियंत्रण किया जा सकता है। आचार्यश्री ने वांट और नीड का सूत्र देते हुए कहा कि किसी चीज की चाह हो गई, उसे करना अच्छा नहीं, आवश्यकता है तो उसकी पूर्ति करना अच्छी बात होती है।
आचार्यश्री ने कालूयशोविलास आख्यान का आरम्भ करते हुए कहा कि छापर चतुर्मास के दौरान हमने इसका आख्यान आरम्भ किया था। छापर परम पूज्य आचार्यश्री कालूगणी की जन्मभूमि है। आचार्यश्री ने कालूयशोविलास के माध्यम से आचार्यश्री कालूगणी के सुजानगढ़ चतुर्मास के प्रसंगों का वर्णन किया। अपने आराध्य के श्रीमुख से ज्ञान की बातों को ग्रहण कर श्रद्धालु अभिभूत थे। आचार्यश्री ने समुपस्थित लोगों को 21 रंगी तपस्या के संदर्भ में उत्प्रेरित करते हुए तपस्वियों को उनकी धारणा के अनुसार उनकी तपस्या का प्रत्याख्यान कराया।













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