डेस्क:भारतीय आवास बाज़ार की मौजूदा तस्वीर उन सपनों से काफी अलग है, जो कभी एक आम मिडल क्लास परिवार अपने घर को लेकर देखा करता था। रिसर्च से सामने आया है कि बीते कुछ वर्षों में संपत्ति की कीमतें घरेलू आय की तुलना में लगभग दोगुनी रफ्तार से बढ़ी हैं। नतीजा—ख्वाबों का घर अब जेब के बाहर हो चला है। सवाल यह है: ये हालात क्यों बने और क्या कोई उम्मीद अब भी बाकी है?
₹1 करोड़ से नीचे के घर गायब क्यों हो रहे हैं?
सप्लाई में तेज़ गिरावट:
2022 से 2024 के बीच, भारत के प्रमुख शहरों में ₹1 करोड़ से कम कीमत वाले घरों की उपलब्धता में औसतन 36% की गिरावट दर्ज हुई।
- हैदराबाद: 70% गिरावट
- मुंबई: 60%
- दिल्ली-एनसीआर: 50%
लग्जरी सेगमेंट का विस्तार:
इसी अवधि में ₹1 करोड़ से अधिक कीमत वाले घरों की आपूर्ति में 48% की बढ़ोतरी देखी गई।
- बेंगलुरु: 187% की वृद्धि
- चेन्नई: 127%
बिल्डर्स अब अधिक मुनाफे वाले हाई-एंड प्रोजेक्ट्स पर ध्यान दे रहे हैं।
आय बनाम संपत्ति मूल्य: दूरी क्यों बढ़ रही है?
तेज़ी से भागती कीमतें:
2020 से 2024 तक रियल एस्टेट की कीमतों में औसतन 9.3% सालाना की दर से इजाफा हुआ, जबकि घरेलू आय की वृद्धि दर केवल 5.4% रही।
शहरों में असमानता और गहराई:
- दिल्ली-एनसीआर: सिर्फ 2024 में ही 49% का उछाल
- मुंबई मेट्रो: प्रति वर्गफुट ₹12,600 की औसत कीमत
- कोलकाता: अपेक्षाकृत स्थिर
अफोर्डेबिलिटी इंडिकेटर्स की चेतावनी
- प्राइस-टू-इनकम (P/I) अनुपात:
भारत का औसत P/I अनुपात 11 है, जबकि वहनीयता का वैश्विक मानक 5 या उससे कम होता है। - ईएमआई-इनकम अनुपात:
2020 में औसतन 46% आय EMI में जाती थी, जो 2024 में 61% तक पहुंच गई।
इसका मतलब है कि एक औसत परिवार अपनी दो-तिहाई आय सिर्फ होम लोन की किश्तों पर खर्च कर रहा है।
समस्या की जड़ में क्या है?
- सर्कल रेट का दुरुपयोग:
बिल्डर्स रजिस्ट्रेशन के लिए कम सर्कल रेट दिखाकर टैक्स की बचत करते हैं, जबकि वास्तविक कीमत का बड़ा हिस्सा कैश में लिया जाता है। इससे न सिर्फ कालाधन बढ़ता है, बल्कि सरकारी राजस्व को भी चोट पहुंचती है। - फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) की कमी:
भारत के मेट्रो शहरों में निर्माण की मंजूरी सीमित है।- दिल्ली: 3.5
- मुंबई: 5
- तुलना में: टोक्यो (20), सिंगापुर (25), न्यूयॉर्क (15)
नतीजा – सप्लाई घटती है और कीमतें चढ़ती हैं।
उम्मीद की किरण: 2025 में क्या बदल सकता है?
- सरकारी हस्तक्षेप:
बजट 2025-26 में ₹15,000 करोड़ के दूसरे SWAMIH फंड की घोषणा की गई है, जिससे मिड-इनकम ग्रुप को राहत मिल सकती है।
“सांभव होम लोन” स्कीम के जरिए ₹10,000 आय वाले भी घर खरीदने का सपना देख सकते हैं। - टियर-2 और 3 शहरों पर फोकस:
71 नए शहरों के विकास की योजना के तहत FSI बढ़ाकर 8-10 करने की तैयारी है, जिससे आवासीय दबाव मेट्रो से हटेगा। - खाली मकानों पर टैक्स:
देश में 1.14 करोड़ मकान खाली पड़े हैं। उन पर वैकेंसी टैक्स लगाने से मार्केट में नई सप्लाई आएगी। - प्राइस ट्रांसपेरेंसी:
RERA को और प्रभावी बनाकर एक केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल पर सभी प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन की कीमतें रियल टाइम दिखाने की योजना है।
2025 में राहत की संभावना
- ब्याज दरों में कटौती:
RBI की रेपो रेट में कमी से होम लोन की EMI घटने लगी है। - अफोर्डेबिलिटी इंडेक्स में सुधार:
JLL के अनुसार, 2025 में कोलकाता की होम अफोर्डेबिलिटी “पीक लेवल” पर होगी। मुंबई और पुणे जैसे शहरों में भी यह इंडिकेटर 90% तक सुधरने की उम्मीद है।
घर का सपना अभी भी जिंदा है—लेकिन वह अब योजना, नीति और पारदर्शिता की राह से होकर ही हकीकत बनेगा। अगर सरकार, डेवलपर्स और नियामक मिलकर गंभीर कदम उठाएं, तो हो सकता है कि एक दिन ‘घर खरीदना’ फिर से मिडल क्लास के लिए एक मुमकिन सपना बन जाए।













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