लाडनूं : जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शुक्रवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘चक्षुरिन्द्रिय निग्रह से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से विश्लेषित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में हम सभी मानव जीवन जी रहे हैं। प्रत्येक प्राणी की आत्मा शाश्वत है। गतियां बदलती रहती हैं—कभी मनुष्य गति, कभी नरक गति, कभी देव गति तो कभी तिर्यंच गति मिलती है। यहां तक कि मोक्ष भी आत्मा का एक पर्याय ही है, क्योंकि मोक्ष सदा से नहीं था। जीव ने पुरुषार्थ करके कर्मों को तोड़ा और मोक्ष अवस्था को पाया। मूल तत्व आत्मा ही है, जो संसारी अवस्था में भी है और सिद्धावस्था में भी। संसारी आत्मा कर्मों से बंधी होती है। आठों कर्मों से आवृत होने के कारण वह संसारी है, और इनसे सर्वथा मुक्त हो जाने पर वही आत्मा सिद्ध कहलाती है।
आत्मा की वास्तविक पहचान उपयोग है। यह उपयोग संसारी और सिद्ध दोनों में रहता है। उपयोग के दो भेद हैं—साकारोपयोग अर्थात् ज्ञान और अनाकारोपयोग अर्थात् दर्शन। जो जानने और देखने वाला है, वही जीव है और जिसमें जानने-देखने की चेतना नहीं है, वह अजीव है। जैसे पुस्तक, घड़ी या कलम—ये अजीव हैं क्योंकि ये न जानती हैं, न देखती हैं, किंतु हम इन्हें जानते हैं, इसलिए हम जीव हैं। जानने वाला जीव ही होता है, जबकि जिसे जाना जाता है वह जीव और अजीव दोनों हो सकता है। केवलज्ञानी सम्पूर्ण लोक-अलोक को एक साथ जानते और देखते हैं, जबकि हमारी जानने-देखने की स्थिति आवरणों के कारण अभी अपूर्ण है। जो गलत है उसे गलत जानना और जो सही है उसे सही जानना अच्छी बात है, पर साधना की सार्थकता इसीमें है कि गलत का त्याग हो और सही को आचरण में उतारा जाए।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि केवल नियति ही सब कुछ नहीं होती। यदि कोई यह मान ले कि जो होना है वही होगा, तो यह एकांत दृष्टिकोण गलत है। कार्य की निष्पत्ति में काल, है। भाव, नियति, कर्म और पुरुषार्थ—इन पांचों समवायों का परस्पर योग आवश्यक होता है। इंद्रिय संयम के दो मूल अंग हैं—निरोध और निग्रह। निरोध का अर्थ है आंख की अवांछनीय प्रवृत्ति को ही रोक देना। जो देखना हमारे लिए अपेक्षित नहीं है, उसे देखने का प्रयास ही न करना या स्वाध्याय व ध्यान के समय आंखों को बंद अथवा स्थिर कर लेना। निग्रह का अर्थ है कि यदि कोई दृश्य सहज रूप से सामने आ जाए, अथवा किसी प्रयोजन से देखना भी पड़े, तो देखते समय भीतर राग या द्वेष के परिणाम न आने देना।
इस प्रकार चक्षुरिन्द्रिय संयम त्रिआयामी बन जाता है। पहला अनपेक्षित दृश्यों को देखना ही नहीं, दूसरा सहज सामने आए दृश्यों में राग-द्वेष न करना और तीसरा आवश्यक कार्यवश देखे जाने वाले प्रसंगों में भी राग-द्वेष का निग्रह रखना। इसका सीधा फल यह होता है कि उस निमित्त से होने वाले नए पाप कर्मों का बंध रुक जाता है और शुभ अध्यवसाय से पूर्वबद्ध कर्मों की निर्जरा होती है। जिनके पास दृष्टि है, उन्हें इसका उपयोग ध्यान और साधना में करना चाहिए। जैसे प्रेक्षाध्यान में अनिमेश प्रेक्षा (त्राटक), नासाग्र दृष्टि, चाक्षुष केंद्र की साधना या खुले आकाश को देखकर एकाग्रता साधना। दूसरा उपयोग स्वाध्याय में है, जहां अपनी आंखों को आगमों और ज्ञान ग्रंथों के पठन में लगाया जाए। तीसरा उपयोग दर्शन में है, जहां वीतराग प्रभु की शांत-सौम्य मुद्रा, श्रद्धेय आचार्यों के चित्रों और संतों के दर्शन कर भीतर शुभ भावों का संचार किया जाए। चौथा और सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक उपयोग अहिंसा और यतना में है। चलते समय ईर्या समिति का पालन करना ताकि पैरों तले कोई सूक्ष्म जीव या चींटी न दब सके। वस्त्रों-पात्रों का प्रतिलेखन सावधानी से करना और खिड़की-दरवाजे बंद करते समय भली-भांति देख लेना कि कोई जीव बीच में न आ जाए। इस प्रकार चक्षुरिन्द्रिय का उपयोग निरोध और निग्रह दो रूपों में किया जा सकता है। मुनि वर्धमानकुमारजी ने आचार्यश्री से 27 दिन की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।













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