पश्चिम एशिया एक बार फिर इतिहास के सबसे खतरनाक मोड़ों में से एक पर खड़ा दिखाई दे रहा है। ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच छिड़ा युद्ध आज सातवें दिन में प्रवेश कर चुका है, लेकिन इन सात दिनों ने ही पूरी दुनिया को यह एहसास करा दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता—उसकी लपटें वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक पहुंच जाती हैं।
पिछले एक सप्ताह में यूरोप से लेकर एशिया तक की अर्थव्यवस्थाएं दबाव में आ गई हैं। तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है और खाड़ी क्षेत्र में कई देशों के सैन्य ठिकाने हमलों का निशाना बने हैं। इस बीच हजारों पर्यटक और तीर्थयात्री भी संकट में फंसे हुए हैं क्योंकि ईरान ने अपना एयरस्पेस बंद कर दिया है।
खामेनेई की मौत से भड़का संघर्ष
इस पूरे संकट की शुरुआत 28 फरवरी को उस समय हुई जब अमेरिका और इजराइल ने संयुक्त सैन्य अभियान के तहत तेहरान सहित कई रणनीतिक ठिकानों पर हमले किए। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु हो गई।
यह घटना पश्चिम एशिया की राजनीति में भूकंप की तरह साबित हुई और इसके तुरंत बाद ईरान ने प्रतिशोधी कार्रवाई शुरू कर दी।
खाड़ी देशों में भी हमलों की गूंज
जवाबी कार्रवाई में ईरान ने मुख्य रूप से इजराइल के साथ-साथ संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन और सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया।
पिछले तीन दिनों में मिसाइल और ड्रोन हमलों के कई दौर हुए हैं, जिससे पूरा खाड़ी क्षेत्र युद्ध के साये में आ गया है।
शनिवार तड़के तेहरान में कई जोरदार विस्फोट हुए, जिनसे आसमान में काले धुएं के गुबार उठते दिखाई दिए। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल की ओर कई मिसाइलें दागीं।
तेल बाजार में भूचाल
इस युद्ध का सबसे बड़ा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। फारस की खाड़ी और समुद्री मार्गों में असुरक्षा के कारण हजारों तेल टैंकर समुद्र में फंसे हुए हैं। इनमें भारत के भी 36 जहाज शामिल बताए जा रहे हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संघर्ष लंबा चला तो तेल की आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है। साद अल-काबी, जो कतर के ऊर्जा मंत्री हैं, ने चेतावनी दी है कि खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने पर कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।
युद्ध के सातवें दिन अमेरिकी कच्चे तेल की कीमत दो वर्षों में पहली बार 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई।
ट्रंप का सख्त रुख
इस संघर्ष के बीच डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने भी सख्त रुख अपनाया है। अमेरिका ने इजराइल को 15.1 करोड़ डॉलर के नए हथियारों की बिक्री को मंजूरी दे दी है।
ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जब तक ईरान “बिना शर्त आत्मसमर्पण” नहीं करता, तब तक उससे किसी प्रकार की बातचीत नहीं की जाएगी।
दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत ने चेतावनी दी है कि उनका देश अपनी रक्षा के लिए “हर आवश्यक कदम” उठाएगा।
युद्ध में रूस की छाया
इस पूरे संकट में रूस की भूमिका भी चर्चा में है। अमेरिकी खुफिया सूत्रों के अनुसार रूस ने ईरान को ऐसी जानकारी उपलब्ध कराई है जिससे वह क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी युद्धपोतों और सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकता है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से फोन पर बातचीत कर खामेनेई की मौत पर संवेदना भी व्यक्त की।
बढ़ता जा रहा मौत का आंकड़ा
सात दिनों में ही यह संघर्ष बेहद खूनी साबित हुआ है। रिपोर्टों के अनुसार ईरान में अब तक 1,200 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।
इसके अलावा लेबनान में 200 से अधिक और इजराइल में करीब 12 लोगों की जान जा चुकी है। इस संघर्ष में छह अमेरिकी सैनिक भी मारे गए हैं।
दुनिया के सामने खड़ा बड़ा सवाल
इस युद्ध ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि यदि पश्चिम एशिया की आग और भड़की तो उसका असर केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक होगा। ऊर्जा संकट, आर्थिक अस्थिरता और सैन्य टकराव का यह मिश्रण दुनिया को एक बड़े भू-राजनीतिक संकट की ओर धकेल सकता है।
हालांकि ईरान के राष्ट्रपति ने संकेत दिया है कि कुछ देशों ने मध्यस्थता की कोशिशें शुरू की हैं, लेकिन फिलहाल मैदान में मिसाइलों की आवाज कूटनीति से कहीं ज्यादा तेज सुनाई दे रही है।
यदि यह युद्ध जल्द नहीं थमा, तो आने वाले दिनों में इसकी कीमत केवल युद्धभूमि ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को चुकानी पड़ सकती है।













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