डेस्क: मध्य पूर्व में जारी तेजी से बदलते सुरक्षा परिदृश्य के बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने सऊदी अरब के रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान से अहम बैठक की है। यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब हाल ही में सऊदी की अरामको तेल रिफाइनरी पर हमला हुआ और अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत के बाद तेहरान ने पूरे क्षेत्र में कड़ी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है। इससे बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय संघर्ष की आशंका बढ़ गई है।
सऊदी रक्षा मंत्री ने ‘एक्स’ पर साझा की गई तस्वीर में बताया कि बैठक में दोनों नेताओं ने ईरानी हमलों के रोकथाम और ‘संयुक्त रणनीतिक रक्षा समझौते’ के तहत आवश्यक उपायों पर चर्चा की। उन्होंने यह भी जोर दिया कि इस तरह की कार्रवाइयां क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को कमजोर करती हैं और उम्मीद जताई कि ईरानी पक्ष समझदारी दिखाएगा।
रणनीतिक महत्व और इस्लामिक नाटो की संभावनाएँ
विशेषज्ञों के अनुसार यह बैठक रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ महीने पहले तुर्की ने पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ मिलकर त्रिकोणीय ‘इस्लामिक नाटो’ जैसा रक्षा गठबंधन बनाने की कोशिश की थी, जिसका उद्देश्य मध्य पूर्व और उसके बाहर सुरक्षा समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित करना है।
पाकिस्तान का समर्थन और समझौते का दायरा
सऊदी रिफाइनरी पर ईरानी हमलों के बाद पाकिस्तान ने रियाद और अन्य खाड़ी देशों के साथ पूरी एकजुटता जताई थी। इस्लामाबाद ने हाल ही में सऊदी अरब के साथ ‘2025 रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौता’ भी किया है, जिसके तहत कहा गया है कि किसी एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा।
इस समझौते में नाटो के ‘आर्टिकल 5’ जैसी प्रावधान मौजूद है, लेकिन मुख्य रूप से यह संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया जानकारी साझा करना और ड्रोन तकनीक तक ही सीमित है। इसमें कोई परमाणु प्रतिबद्धता शामिल नहीं है।
सैन्य कार्रवाई या कूटनीति?
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ बातचीत में पूर्ण समर्थन जताया है, लेकिन सैन्य तैनाती के बजाय शांति प्रयासों और कूटनीतिक सहयोग पर जोर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान सीधे सैन्य हस्तक्षेप में जाने से बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में फंस सकता है, जिससे उसकी पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इसलिए इस्लामाबाद अपने समर्थन को मुख्यतः कूटनीति, रसद और हवाई मार्ग की अनुमति तक सीमित रखेगा।













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