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ज्ञानात्मक आराधना का महत्त्वपूर्ण अवसर बने योगक्षेम वर्ष : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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Home आराधना-साधना

ज्ञानात्मक आराधना का महत्त्वपूर्ण अवसर बने योगक्षेम वर्ष : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में त्रिदिवसीय अनुष्ठान का दूसरा दिन 

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February 17, 2026
in आराधना-साधना
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ज्ञानात्मक आराधना का महत्त्वपूर्ण अवसर बने योगक्षेम वर्ष : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
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ज्ञानात्मक आराधना का महत्त्वपूर्ण अवसर बने योगक्षेम वर्ष : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
लाडनूं  : वर्षों बाद जैन विश्व भारती, लाडनूं में योगक्षेम वर्ष के उद्देश्य से विराजमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में योगक्षेम वर्ष के शुभारम्भ से पूर्व त्रिदिवसीय आध्यात्मिक अनुष्ठान भी प्रारम्भ हो गया है।
आध्यात्मिक अनुष्ठान के दूसरे दिन मंगलवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ के साथ महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अनेकानेक मंत्रों के जप का प्रयोग कराया। तदुपरान्त शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि बत्तीस आगम हमारे धर्मसंघ की व्यवस्था में सम्मत हैं, जिनमें ग्यारह अंग, बारह उपांग, चार मूल, चार छेद और एक आवश्यक। ये आगम प्रमाण के रूप में मान्य किए गए हैं। ग्यारह अंगों को तो स्वतः प्रमाण कहा गया है, इसके साथ सभी बत्तीस ही आगम प्रमाणभूत हैं। साधु-साध्वियां व समणियां भी इनका स्वाध्याय और पारायण करते हैं। हम लोगों के पास बत्तीस आगमों का मूलपाठ उपलब्ध है। मूलपाठ को पढ़ने से ही उसके भावार्थ को समझ लेना तो ज्ञान के क्षेत्र में बहुत अच्छी गति की बात हो सकती है। अनुवाद तो उस मूलपाठ का आधार होता है। मूलपाठ से अर्थ समझ आ जाता है तो ज्ञान की अच्छी प्रगति मानी जा सकती है। ज्ञान की और अच्छी बात हो सकती है कि मूलपाठ के आधार पर अनुवाद की गलती को भी पकड़ लिया जाए तो कितनी अच्छी बात हो सकती है। अनुवाद करने में पक्षपात की भावना नहीं, बल्कि तटस्था हो तो बहुत अच्छी बात हो सकती है।
आगम के अनुवाद का कार्य गुरुदेवश्री तुलसी के समय से प्रारम्भ हुआ। उनके साथ आचार्यश्री महाप्रज्ञजी भी इससे जुड़े और वे तो मानों आगम कार्य के लिए समर्पित ही हो गए। योगक्षेम वर्ष का समय सामने है। साधु-साध्वियां व समणियां हैं। न्यारा में रहने पर गोचरी जाने व अन्य कार्य आदि में भी समय लगाने होते होंगे, किन्तु यहां होने से अन्य कार्यों में समय लगाने की आवश्यकता नहीं है तो इस लम्बे समय का लाभ आगम स्वाध्याय के रूप में लिया जाए। ऐसा प्रयास हो कि इस बारह महीनों में कई आगम स्वाधित हो सकते हैं। साथ ही उसमें से कुछ नोट भी बना लिया जाए तो व्याख्यान आदि देने के लिए अच्छी सामग्री तैयार की जा सकती है।
इस प्रकार इस योगक्षेम वर्ष का अपने-अपने ढंग से अच्छा उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। आगम के सिवाय और भी कोई साहित्य आदि का कार्य करना हो तो वह भी अच्छी बात हो सकती है। कोई आगम संबंधी कार्य भी करना है तो उसमें भी समय लगाने का प्रयास करना चाहिए। गुरुदेव तुलसी के समय प्रारम्भ हुए इस कार्य को जितनी गति जी सके और यह कार्य कुछ वर्षों में सुसम्पन्न हो जाए तो कितनी बड़ी बात हो सकती है। अनेक साधु, साध्वियों व समणियों को जो अलग-अलग कार्य सौंपे हुए हैं, इस योगक्षेम वर्ष की अवधि में उस कार्य को पूर्ण करने का प्रयास किया जा सकता है। इसी प्रकार जो साधु, साध्वियां, समणियां अध्ययन में आगे बढ़ना चाहें, पीएचडी आदि करनी हो तो उनके लिए भी यह योगक्षेम वर्ष स्वर्णिम काल के समान हो सकता है। उनके लिए तो जैन विश्व भारती और ग्रन्थागार आदि के रूप में लगभग सारी सामग्रियां उपलब्ध हो सकती हैं। उनके लिए तो अभी मानों स्वर्णिम काल है। विश्वविद्यालय से संबंधित अध्ययन व महाप्रज्ञ श्रुताराधना आदि के पाठ्यक्रमों में भी समय लगाकर ज्ञान के क्षेत्र में बहुत अच्छा विकास किया जा सकता है। उसमें भी मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित होना और सामूहिक रूप में कोई चर्चा और ज्ञान की बात हो तो बहुत अच्छी बात हो सकती है। इसके माध्यम से भी स्वयं को लाभान्वित किया जा सकता है। इस प्रकार यह योगक्षेम वर्ष भी हमारे कार्य करने का महत्त्वपूर्ण अवसर बन सकता है।
आचार्यश्री की अनुज्ञा से नवदीक्षित साध्वी व समणी ने संतवृंद को वंदन किया तो संतवृंद की ओर से मुनि धर्मरूचिजी ने नवदीक्षित साध्वी व समणी के प्रति मंगलकामना की। तदुपरान्त बहिर्विहार से गुरु सन्निधि में पहुंची साध्वीवृंद व समणीवृंद ने भी आचार्यश्री सहित मुख्यमुनिश्री आदि संतवृंद से खमतखामणा करते हुए सुखपृच्छा की तो संतवृंद की ओर से मुनि धर्मरूचिजी ने साध्वीवृंद व समणीवृंद से खमतखामणा व मंगलकामना की। तदुपरान्त अग्रणी संतवृंद ने भी साध्वी समुदाय से खमतखामणा की।
मुनि कौशकुमारजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए गीत का संगान किया। मुनि विनोदकुमारजी ने भी अपनी भावनाओं की श्रद्धाभिव्यक्ति दी।
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