बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर का आज महापरिनिर्वाण दिवस है। उन्होंने 6 दिसंबर, 1956 को अपने निधन से कुछ वर्ष पहले ही बौद्ध मत अपना लिया था। यह कदम उन्होंने अपनी घोषणा के तहत ही उठाया था। उन्होंने नागपुर में बौद्ध मत की दीक्षा ली थी और इसी के कारण नागपुर को दीक्षाभूमि भी कहा जाता है। भीमराव आंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस पर बड़ी संख्या में दलित समाज के लोग नागपुर पहुंचते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। यहां यह जानना दिलचस्प है कि आखिर भीमराव आंबेडकर ने बौद्ध मत ही क्यों अपनाया। जबकि उन्हें इस्लाम, ईसाइयत और सिख समाज से भी आमंत्रण था कि उनके मजहब को स्वीकार कर लें।
इसकी वजह भीमराव आंबेडकर ने खुद ही अपने एक निबंध में बताई थी। ‘बुद्ध ऐंड फ्यूचर ऑफ हिज रिलीजन’ शीर्षक से यह निबंध 1950 में कोलकाता की महाबोधि सोसायटी की मासिक पत्रिका में छपा था। इसमें उन्होंने हिंदू, इस्लाम, ईसाई और बौद्ध धर्म के बारे में अपनी तुलनात्मक राय जाहिर की थी। उन्होंने इसमें बुद्ध, जीसस, पैगंबर मोहम्मद और भगवान कृष्ण के संदेशों का भी जिक्र किया था और विस्तार से बताया था कि सभी के तुलनात्मक अध्ययन के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को ही क्यों चुना।
भीमराव आंबेडकर उस निबंध में लिखते हैं, ‘धर्म के अनेक संस्थापकों में से चार ऐसे हैं जिनके धर्मों ने न केवल अतीत में दुनिया को प्रभावित किया है बल्कि आज भी लोगों के विशाल जनसमूह पर प्रभाव डाल रहे हैं। वे हैं बुद्ध, ईसा, मोहम्मद और कृष्ण। इन चारों के व्यक्तित्व और उनके धर्मों के प्रचार में उनके द्वारा अपनाए गए रुख की तुलना करने पर एक छोर पर बुद्ध दिखते हैं तो दूसरे छोर पर अन्य तीन लोग। दोनों ही विरोधाभास नजर आते हैं, जिन पर बात करना जरूरी है।’ वह कहते हैं कि महात्मा बुद्ध के बारे में सबसे अहम बात यह है कि वह खुद को भी खारिज का विकल्प देते हैं।
पैगंबर और ईसा मसीह की किन दावों पर आंबेडकर ने उठाए सवाल
वह लिखते हैं, ‘पूरी बाइबिल में ईसा मसीह इस बात पर जोर देते हैं कि वे ईश्वर के पुत्र हैं और जो लोग ईश्वर की आराधना करना चाहते हैं, वे उन्हें मान्यता दिए बिना असफल हो जाएंगे। पैगंबर मोहम्मद उनसे एक कदम आगे निकल गए। ईसा मसीह की तरह उन्होंने भी दावा किया कि वे धरती पर ईश्वर के दूत हैं। लेकिन उन्होंने आगे जोर देकर कहा कि वे अंतिम दूत हैं। इस आधार पर उन्होंने घोषणा की कि जो लोग मोक्ष चाहते हैं, उन्हें न केवल यह स्वीकार करना चाहिए कि वे ईश्वर के दूत हैं, बल्कि यह भी स्वीकार करना चाहिए कि वे अंतिम दूत हैं। कृष्ण ईसा मसीह और मोहम्मद दोनों से एक कदम आगे निकल गए। उन्होंने खुद को ईश्वर का पुत्र नहीं कहा बल्कि खुद को देवाधिदेव कहा यानी देवताओं के भी देवता।’
‘क्यों बुद्ध की शिक्षाओं को आंबेडकर ने सबसे सही माना’
इसके आगे वह बुद्ध के बारे में कहते हैं कि वह सबसे अलग हैं। वह खुद को ईश्वर के रूप में नहीं मानते। आंबेडकर लिखते हैं, ‘बुद्ध ने कभी भी खुद को ऐसी कोई स्थिति नहीं दी। वह एक मनुष्य के पुत्र के रूप में पैदा हुए थे और एक आम आदमी बने रहने में संतुष्ट थे और एक आम आदमी की तरह ही अपने धर्म का प्रचार करते थे। उन्होंने कभी किसी अलौकिक उत्पत्ति या अलौकिक शक्तियों का दावा नहीं किया और न ही उन्होंने अपनी अलौकिक शक्तियों को साबित करने के लिए चमत्कार किए। बुद्ध ने मार्गदाता और मोक्षदाता के बीच स्पष्ट अंतर किया। ईसा, मोहम्मद और कृष्ण ने खुद को मोक्षदाता होने का दावा किया। बुद्ध मार्गदाता की भूमिका निभाने से संतुष्ट थे।’
‘बुद्ध ने कभी नहीं किया खुद के अचूक होने का दावा’
भीमराव आंबेडकर कहते हैं कि इन 4 धर्मों में एक और भी अंतर है। वह लिखते हैं, ‘चार धार्मिक शिक्षकों के बीच एक और अंतर भी है। ईसा और मोहम्मद दोनों ने दावा किया कि उन्होंने जो सिखाया वह ईश्वर का वचन था और ईश्वर के वचन के रूप में उन्होंने जो सिखाया वह अचूक और सवाल से परे था। कृष्ण अपनी धारणा के अनुसार देवताओं के ईश्वर थे और इसलिए उन्होंने जो सिखाया वह ईश्वर का वचन था, ईश्वर द्वारा कहा गया, वे मौलिक और अंतिम थे और अचूकता का सवाल ही नहीं उठता। बुद्ध ने जो सिखाया उसके लिए ऐसी कोई अचूकता का दावा नहीं किया।’













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