डेस्क : यूपी के पूर्वांचल की धरती अब दुनिया के सबसे महंगे आम ‘जापानी मियाजाकी’ की खेती के लिए तैयार हो रही है। आजमगढ़ स्थित कृषि विज्ञान केंद्र लैदौरा में इस विदेशी प्रजाति का मदर प्लांट विकसित किया जा रहा है, जिससे आगे कलम (ग्राफ्टिंग) के जरिए पौधे तैयार किए जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे आने वाले वर्षों में यह दुर्लभ आम क्षेत्र की नई पहचान बन सकता है।
जापान का मियाजाकी आम अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी असाधारण कीमत और विशेष गुणों के कारण जाना जाता है। इसकी कीमत वैश्विक स्तर पर लगभग दो लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक बताई जाती है, जबकि स्थानीय बाजारों में यह 70 हजार से लेकर दो लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच जाती है। स्वाद, सुगंध और पोषक तत्वों से भरपूर यह आम अपने आकर्षक लाल-जामुनी और हरे रंग के मिश्रण के कारण भी खास पहचान रखता है।
कृषि विज्ञान केंद्र लैदौरा में तैयार किए गए पौधों को मदर प्लांट के रूप में संरक्षित किया जा रहा है। यहां से तैयार कलमों के माध्यम से किसानों और बागवानों को पौधे उपलब्ध कराए जाएंगे। विशेषज्ञों के अनुसार, कलम से तैयार पौधे तीन से पांच वर्षों में फल देने लगते हैं, जबकि बीज से तैयार पौधों में फल आने में लगभग 10 वर्ष का समय लग सकता है।
केंद्र के प्रभारी डॉ. एल.सी. वर्मा ने बताया कि पौधों को पुणे की एक नर्सरी से लाकर विकसित किया गया है और इन्हें आगे मदर प्लांट के रूप में उपयोग किया जाएगा। उन्होंने बताया कि मियाजाकी आम के पौधे लगाने का उपयुक्त समय जुलाई से सितंबर के बीच होता है।
वर्तमान में यह दुर्लभ किस्म मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल की कोलकाता और ठाकुरनगर स्थित नर्सरियों तथा महाराष्ट्र के पुणे की कुछ चुनिंदा नर्सरियों में उपलब्ध है। इसके अलावा मध्य प्रदेश के जबलपुर और ओडिशा में भी इसकी सीमित खेती शुरू हुई है।
इसी बीच, सोनभद्र जिले के छपका गांव में भी इस खास आम की खेती का प्रयोग देखने को मिला है, जहां वरिष्ठ अधिवक्ता उमेशधर दुबे ने पिछले वर्ष 15 अगस्त को इसका पौधा लगाया था।
आजमगढ़ के चार प्रमुख ब्लॉकों—रानी की सराय, मिर्जापुर, अहरौला और पवई—में पहले से ही आम की व्यापक खेती होती है। इन क्षेत्रों में लगभग 12 प्रतिशत भूमि पर आम के बाग मौजूद हैं। ऐसे में मियाजाकी आम की संभावनाएं यहां कृषि अर्थव्यवस्था को एक नया आयाम दे सकती हैं।













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