डेस्क : नई रिपोर्ट में सामने आया है कि डोनाल्ड ट्रंप की बहुचर्चित टैरिफ नीति का वास्तविक असर अमेरिकी उपभोक्ताओं और कारोबारियों पर पड़ा। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क के अर्थशास्त्रियों के अध्ययन के अनुसार, आयात शुल्क का लगभग 90 प्रतिशत खर्च अमेरिका के भीतर ही झेला गया।
यूएसए टुडे के मुताबिक, टैक्स फाउंडेशन की रिपोर्ट में अनुमान है कि 2025 में हर अमेरिकी परिवार पर इस नीति का अतिरिक्त बोझ लगभग 1000 डॉलर होगा, जो 2026 में बढ़कर 1300 डॉलर तक पहुंच सकता है।
रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि आयातित वस्तुओं पर लगाए गए टैरिफ का अधिकांश हिस्सा अमेरिकी बाजार में कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में समा गया। विदेशी निर्यातकों ने अपने दाम में केवल सीमित कटौती की, जिससे लागत अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं तक पहुंच गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन के दौरान चीन सहित कई देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर लगाए गए भारी शुल्क का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ा। टैरिफ के कारण कंपनियों की लागत बढ़ी, जिससे उत्पादों और सेवाओं की कीमतें भी बढ़ीं। इसका व्यापक असर महंगाई दर पर भी पड़ा।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि व्यापार नीति बनाते समय उसके व्यापक प्रभावों का ध्यान रखना अनिवार्य है। यदि संरक्षणवादी कदमों का भार मुख्य रूप से घरेलू उपभोक्ताओं और व्यवसायों पर ही पड़े, तो नीति के लाभ सीमित हो सकते हैं। रिपोर्ट संकेत देती है कि वैश्विक व्यापार की जटिलताओं में, किसी भी देश द्वारा उठाए गए टैरिफ कदम अंततः उसके अपने बाजार को प्रभावित कर सकते हैं।













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