लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में आज के निर्धारित विषय ‘कल की इच्छा कौन करे?’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि काल नाम का द्रव्य है। अनंत काल अतीत की सीमा में हैं और अनंत काल अनागत में हैं। वर्तमानकाल तो बहुत ही स्वल्प होता है। वर्तमान समय अत्यंत स्वल्प होता है। शास्त्रकार ने बताया कि धर्म की दृष्टि से कोई काम कल पर वही छोड़ सकता है, अथवा कल की इच्छा तीन व्यक्ति कर सकते हैं, जिसका मृत्यु के साथ मित्रता है। वह कल की बात सोच सकता है। दूसरा वह आदमी जो दौड़ने में इतना सक्षम हो कि मृत्यु के हाथ न आए और तीसरा वह आदमी होता है, जो अमर हो। ऐसे तीनों प्रकार के आदमी धरती पर नहीं हो सकते। इसलिए आदमी को अपने कार्य अथवा किसी भी धार्मिक कार्य को कल पर नहीं टालना चाहिए।
आदमी को कल पर कार्य छोड़ने से बचने का प्रयास करना चाहिए। आलस्य के कारण से कार्य को विलम्बित करने से कोई फायदा। जितना संभव हो सके, आदमी को धर्म, ध्यान, स्वाध्याय, जप, तपस्या आदि प्रतिदिन करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी पैदा होता है तो मृत्यु को साथ लेकर ही आता है। जन्म-मृत्यु का चक्र चलता है। जन्म और मृत्यु के बीच के समय का अच्छा लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए।
शास्त्रकार ने मानों आगाह किया है कि मृत्यु कभी भी हो सकती है तो आदमी को अपने अच्छे कार्यों को कल पर नहीं छोड़ना चाहिए। जो भी हो, उसे आज करने का प्रयास होना चाहिए। जहां तक हो सके, आदमी को दूसरों को देने का प्रयास करना चाहिए। वस्तु देना भी दान है तो किसी को ज्ञान देना भी दान ही है। किसी के पास यदि विद्या है तो उसे दूसरों को भी देने का प्रयास करना चाहिए। विद्या का ज्ञान जितना बांटा जाता है, दूसरों को दिया जाता है, ज्ञान में उतनी ही वृद्धि होती है। बांटने से विद्या भी बढ़ती है। जितना संभव हो सके आदमी को ज्ञान का दान करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को औचित्य के साथ और तत्परता से अपने कार्य को करने का प्रयास करना चाहिए।
आदमी को अपने कल्याण के लिए अपनी आत्मा को मित्र बनाने का प्रयास करना चाहिए। औरों के साथ दोस्ती होती है तो कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन अपनी आत्मा मित्र बन जाए तो आदमी के जीवन का कल्याण हो सकता है। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ में अर्हत वंदना चलती है। सुबह-शाम दोनों समय यह वंदना होती है। आदमी को इसे शुद्ध ढंग से करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी बुढ़ापे के साथ मैत्री कर ले। रोग के साथ मित्रता कर ले और मनोबल रखे।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया तो अनेक चारित्रात्माओं ने अपनी जिज्ञासाओं को आचार्यश्री के समक्ष प्रस्तुत किया, जिसे आचार्यश्री ने उत्तरित किया।
आज मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान संस्कार निर्माण शिविर में भाग लेने वाले शिविरार्थी बच्चे आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित थे। शिविरार्थी श्री सारंग बोथरा ने अपने शिविर के अनुभवों को अभिव्यक्ति दी। श्री राजेश बाफना ने अपनी अभिव्यक्ति दी। शिविरार्थी बच्चों ने गीत का संगान किया। शिविरार्थी लक्षिता बोथरा व दिव्यांश सेठिया ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। शिविरार्थी बालिकाओं ने भी गीत को प्रस्तुति दी। उपस्थित शिविरार्थी बालक-बालिकाओं को मुख्यमुनिश्री ने अभिप्रेरित किया। तदुपरान्त आचार्यश्री ने समुपस्थित शिविरार्थी बालक-बालिकाओं को अच्छे संस्कारों के विकास की मंगल प्रेरणा प्रदान की।













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