जयपुर : अजमेर रोड स्थित टैगोर नगर के नवोदित अणुव्रत भवन में गुरुवार को “शांति और मैत्री” विषय पर आयोजित प्रवचन कार्यक्रम में मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि यदि जीवन में वास्तविक शांति की आकांक्षा है तो किसी भी व्यक्ति के प्रति शत्रुता का भाव नहीं रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी को भी अपना दुश्मन मानना अंततः मन की अशांति का कारण बनता है, क्योंकि संसार के सभी जीव किसी न किसी रूप में हमारे ही पूर्व संबंधों की श्रृंखला से जुड़े हुए हैं।
मुनि श्री ने अपने प्रवचन में समझाया कि किसी को पराया मानकर उसके प्रति वैर या विरोध का भाव रखना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक प्राणी के साथ मैत्री का भाव स्थापित करना ही भगवान महावीर का वह सार्वभौमिक संदेश है, जो संपूर्ण विश्व को शांति और सद्भाव की दिशा प्रदान करता है।
उन्होंने आगे कहा कि मनुष्य के भीतर राग और द्वेष की प्रवृत्तियाँ ही मित्रता और शत्रुता के भावों की जन्मदाता हैं। इनसे मुक्ति पाने के लिए पक्ष और विपक्ष के भावों से ऊपर उठकर साक्षी भाव को विकसित करना आवश्यक है। द्रष्टा भाव में स्थित रहना ही वीतरागता की साधना है, और इसी साधना से जीवन में स्थायी शांति का अनुभव संभव होता है। साथ ही इसी अवस्था में सभी प्राणियों के प्रति स्वाभाविक मैत्री का भाव भी जागृत होता है।
कार्यक्रम में उपस्थित मुनि श्री संभव कुमार जी ने अपने संदेश में कहा कि सभी जीवों को क्षमा करना और सभी से क्षमा माँगना मानसिक तनाव से मुक्ति का सर्वोत्तम उपाय है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक प्राणी को आत्मवत और आत्मतुल्य मानकर व्यवहार करना ही परम शांति का मार्ग है। धर्म और अध्यात्म का मार्ग केवल व्यक्तिगत शांति ही नहीं, बल्कि विश्व शांति की स्थापना का भी माध्यम बनता है।
मुनि श्री ने “खमतखामणा” की प्रक्रिया को मानसिक भार से मुक्ति का व्यावहारिक अभ्यास बताते हुए कहा कि क्षमा माँगना और क्षमा करना हृदय की उदारता, सरलता और सहिष्णुता के बिना संभव नहीं है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में तीर्थंकर नामी प्रभु की स्तुति की गई। उपस्थित श्रद्धालुओं ने संत वाणी का गहन मनन करते हुए श्रद्धापूर्वक श्रवण किया तथा अंत में कृतज्ञ भाव से संतों का अभिवादन किया।













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