लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि को प्राप्त कर जैन विश्व भारती परिसर गुलजार बन गया है। नित नूतन आयोजनों में शामिल होने के लिए देश-विदेश के सैंकड़ों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित हो रहे हैं और इस सुअवसर का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। शुक्रवार को आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान मंगल प्रवचन के उपरान्त मुनि प्रसन्नकुमारजी की स्मृति सभा का आयोजन हुआ तो वहीं आज भी आचार्यश्री के जन्मोत्सव व पट्टोत्सव के संदर्भ में प्रस्तुतियों का क्रम बना रहा।
सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘किसका संयम-किससे बेहतर’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि उत्तरज्झयणाणि आगम में तीन प्रकार के मनुष्य बताए गए हैं- अव्रती मनुष्य, देशविरति मनुष्य और सर्वविरति मनुष्य। इसमें संसार के सम्पूर्ण मनुष्य आ जाते हैं। वैसे मनुष्य, जिनमें कोई त्याग, तपस्या, संयम, व्रत, नियम आदि नहीं होता। धार्मिक दृष्टि से वे असंयमी होते हैं। आशा, लालसा बने रहने के कारण आदमी अव्रती ही रह जाता है। जब आदमी वृद्ध हो जाता है तो चेहरे पर झुर्रियां आ जाती हैं, शरीर गल जाता है, मुंह दंतविहीन हो जाता है, आदमी लाठी के सहारे चलता है तो भी आदमी से आशा, लालसा और अव्रत नहीं छूटता है। असंयमी व्यक्ति की यह दशा हो सकती है। वृद्धावस्था में कमजोरी के कारण इन्द्रियां भी मानों साथ छोड़ देती है। कान से कम सुनाई देना, केश सफेद हो जाते हैं, आंखों से कम दिखाई देना अथवा नहीं दिखाई देना, हाथों में कम्पन्न, पैरों में दर्द हो जाता है, भला ऐसे में आदमी कितना क्या कर सकता है। कई बार कुछ संन्यासी ऐसे भी हो सकते हैं, जिनसे अधिक संयम एक गृहस्थ में मिल जाता है। गृहस्थों में व्याप्त संयम को देशविरति संयम कहा जाता है। मनुष्य पंचम गुणस्थान वाला होता है तथा कोई-कोई भिक्षु प्रथम गुणस्थान वाला भी हो सकता है। गृहस्थों की अपेक्षा साधुओं का संयम ऊंचा और श्रेष्ठ होता है।
इस प्रकार अव्रती से ज्यादा देशविरति वाला आदमी ज्यादा श्रेयस्कर होता है। आदमी को अपना अधिक से अधिक समय शुभयोगों में बिताने का प्रयास करना चाहिए। जितना शुभ योग में रहने का प्रयास होता है, जीवन के कल्याण की बात ही है। आदमी को अपने संयम का निरंतर विकास करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को जितना संभव हो सके, समय संयोजन का प्रयास करना चाहिए। जहां तक संभव हो सके, समय का सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। योगक्षेम वर्ष के दौरान साधु, साध्वियों व समणियों को अपनी समय का अच्छा उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। जितना संभव हो सके, आगम स्वाध्याय और ज्ञान वृद्धि का प्रयास करना चाहिए। अच्छे जानकार साधु-साध्वियों को अध्यापन कराने का भी प्रयास करना चाहिए। अध्यापन भी ज्ञान का अधिक विकास कराने वाला हो सकता है। देने वाला उदारता से ज्ञान दे और ज्ञान ग्रहण करने वाला विनय के साथ ज्ञान ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार सभी गृहस्थों से साधुओं का संयम श्रेष्ठ होता है। कई बार वेश से साधु होता है, लेकिन वह परिग्रह संग्रह करने वाला है। धन-संपत्ति का लेन-देन करने वाला होता है तो वह बड़े दोष की बात होती है। साधुपन की बड़ी-बड़ी गलतियां महापाप की बात होती है। जिससे साधुपन न पले, उसे साधुपन को छोड़ने का भी प्रयास करना चाहिए। साधुपन के वेश में रहते हुए बड़े-बड़े दोष से बचने का प्रयास करना चाहिए। साधुपन को पूरा पाल लेना बहुत बड़ी बात होती है। इस प्रकार कहा जाता है कि कई नामधारी साधु जो संयम का पालन नहीं करते, उनसे देशविरति गृहस्थ अच्छे होते हैं और सभी गृहस्थों से संयम व व्रत का पालन करने वाले साधु श्रेष्ठ होते हैं।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में मुनि प्रसन्नकुमारजी की स्मृतिसभा का आयोजन किया गया, जिसमें आचार्यश्री ने उनका संक्षिप्त जीवन परिचय प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की। तदुपरान्त आचार्यश्री ने उनकी आत्मा के कल्याण के लिए चार लोगस्स का ध्यान किया। तत्पश्चात मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी व साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने भी उनकी आत्मा के ऊर्ध्वारोहण के प्रति मंगलकामना की। मुनि धैर्यकुमारजी, मुनि वीतरागकुमारजी, मुनि कमलकुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री महाश्रमणजी के जन्मोत्सव व पट्टोत्सव के संदर्भ में मुनि तन्मयकुमारजी ने गीत को प्रस्तुति दी।













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